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रविवार, 4 दिसंबर 2011

सम्वेदना

वेदना सम्वेदना बीते दिनों की बात है,
 बढ़ते हुए बाजार में सब बन गया उत्पाद है,
कौन देगा मूल्य मेरी भावनाओं का अधिक,
 आज मेरा आत्म खुद उत्पाद बन तैयार है,
और यदि अवमूल्यित हो कोई मुझसे भी अधिक,
 सूचकांकों में उसी के वृद्धि के आसार हैं |




      बाजार में अपनी असलियत को कभी कहना नहीं,
        मूर्ख ! ये सब सूत्र ही व्यापार के आधार हैं,
      दो रूपये के चिप्स में दस रूपये की हवा भर,
     बेच दो सोलह रूपये में बाजार अब उदार है,
      झूठ के उत्पाद को विज्ञापनों की चमक से,
     एक मृगतृष्णा बना दो आधुनिक व्यापार है |



साधनों की होड़ की ऐसी अँधेरी दौड़ में,
 साध्य की मीमांसा का प्रश्न ही बेकार है,
व्यक्ति और उपभोक्ता का जैसे पृथक अस्तित्व है,
 व्यक्ति का स्वातंत्र्य अब उपभोक्ता पर भार है,
इस बड़े बाजार का परमात्मा कोई नहीं,
 बिक रहा परमात्मा भी अब सरे-बाजार है | 

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