भारत दैट इज इंडिया जिसे आर्याव्रत भी कहते है में टोपी पहनने और टोपी पहनाने की प्राचीन परम्परा रही है |
पुराने जमाने से लोग टोपी पहनने और पहनाने की इस उदात्त परम्परा में भारी रूचि दर्शाते आये है | आजादी पाने के बाद तो इस परंपरा की लोकप्रियता में भारी उछाल देखने को मिला और अब तो यह परम्परा हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अटूट हिस्सा बन चुकी है और इस कदर बन चुकी है की अब हम इसे ही लोकतंत्र मानने लगे है, मानो हमने इस परंपरा को अंगीकृत , अधिनियमित
और आत्मर्पित कर लिया हो |
पुराने जमाने से लोग टोपी पहनने और पहनाने की इस उदात्त परम्परा में भारी रूचि दर्शाते आये है | आजादी पाने के बाद तो इस परंपरा की लोकप्रियता में भारी उछाल देखने को मिला और अब तो यह परम्परा हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अटूट हिस्सा बन चुकी है और इस कदर बन चुकी है की अब हम इसे ही लोकतंत्र मानने लगे है, मानो हमने इस परंपरा को अंगीकृत , अधिनियमित
और आत्मर्पित कर लिया हो |
हमारे इस लोकतान्त्रिक टोपीवाद में हर कोई टोपी पहनने -पहनाने के लिए स्वतंत्र है | हम इस कदर उदार है कि ना तो कोई टोपी पहनने का बुरा मानता है और ना तो कोई टोपी पहनाने का | टोपी पहनने और पहनाने की यह प्रक्रिया दोनों पक्षो को लाभ पहुचाती है | टोपी पहनाने वाला सोचता है की मैने टोपी पहना दी और टोपी पहनने वाला सोचता है की एक तो इससे सर्दी से मेरा बचाव हो गया और दूसरे टोपी पहनने से मैं सभ्य भी दिखने लगा , इस तरह टोपी पहनने वाला भी खुश और टोपी पहनाने वाला भी खुश |
बचपन में एक कहानी सुनी थी , रास्ते से जाते हुए एक सौदागर की टोपियाँ जब बंदरो ने चुरा ली तो उसने खुद पहनी हुई टोपी उतार कर फेंक दी , इसे देख कर नकलची बंदरो ने चुरायी हुई टोपियाँ फेक दी और चतुर व्यापारी अपनी टोपियाँ वापस पा कर चला गया | कभी - कभी इसका उल्टा भी होता
है | दूसरे को टोपी पहना हुआ देख कर बन्दर फेकी हुई टोपी फिर से पहन लेते हैं पर इससे क्या बन्दर भी इंसान बन जाते है ? .............. हो भी सकता है क्योकि भारतीय कहानियो का अन्त अक्सर सुखांत हुआ करता है |
हाल के दिनों में टोपी पहनने और पहनाने की इस अद्भुत परम्परा में एक नया प्रयोग देखने को मिला | राजनीति के एक महान वैज्ञानिक ने अपनी जगतप्रसिध्द प्रयोगशाला में एक नवीन प्रयोग किया , इस अद्भुत परम्परा में एक नया आयाम जोड़ा , उसने टोपी ना पहन कर भी लोगो को टोपी पहना दी | इस नए प्रयोग के बारे में लोगो ने तरह तरह के विचार व्यक्त किये | परम्परावादी स्कूल से जुड़े लोगों ने कहा कि आधी सदी से अधिक पुरानी इस परम्परा में किसी प्रकार का फेर-फार उचित नहीं होगा , जो जैसा चल रहा है उसे वैसा ही चलने दिया जाय , तो राष्ट्रवादी स्कूल से सम्बद्ध लोगों ने कहा कि यदि टोपी की जगह पगड़ी पहन ली जाय तो यह प्राचीन परम्परा और अधिक भारतीय लगने लगेगी | राजनीति का महान वैज्ञानिक महान राष्ट्रवादी भी था , उसने टोपी ना पहन कर पगड़ी को वरीयता दी , मगर पगड़ी तो हमारे माननीय प्रधानमन्त्री जी भी पहनते है , लेकिन प्रधानमंत्री जी के तो दाढ़ी भी है |
अरे ! अद्भुत किन्तु सत्य! मानो या ना मानों पर दाढ़ी तो उस महान वैज्ञानिक के भी है.............................................
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