९० के दशक में एक और बड़ी घटना घटी । भारत का सामना अब अकस्मात् उदारीकरण और
वैश्वीकरण से हुआ । यह प्रक्रिया अपने साथ आर्थिक बदलाव तो ले कर आई ही , सांस्कृतिक
रूप से एक बड़े परिवर्तन की वाहक भी बनी । कम से कम जमीनी स्तर पर उदारीकरण का प्रभाव आर्थिक रूप में कम और सांस्कृतिक रूप में अधिक दिखाई देता है । राह चलते नुक्कड़
की पान की दूकान पर जब आप लोक - संगीत की जगह ब्राजील जैसे कैरेबियन गाने की धुन
सुनते है या फिर युवा वर्ग में ब्रांडो के प्रति बढती ललक देखते है तो यह सांस्कृतिक रूप से
आपको चौंकाने वाली स्थिति होती है । यह सम्पूर्ण प्रक्रिया अत्यंत व्यवस्थित और सुनियोजित
ढंग से प्रारभ हुई है और सबसे बड़ी बात कि इसे हमने खुद आमंत्रित किया है । मॉस मीडिया
और प्रचार माध्यमो - विज्ञपनो द्वारा एक पूर्णतया उन्मुक्त और भोगवादी संस्कृति हम पर
थोपी जा रही है और वह भी इतनी तेजी से कि एक पूरी कि पूरी पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी
से अजनबी बनती जा रही है । यह संस्कृति ( या अपसंस्कृति ) पहले तो झूठी आवश्यकताएं
पैदा करती है और फिर उपभोग को बढ़ावा देते हुए उन्हें एक एसे आदर्श के रूप में प्रस्तुत
करती है मानो उनका उपयोग करना करना ही समकालीन होने या आधुनिक होने की पहली
शर्त हो । इस पूरी प्रक्रिया में आपके सामने सिर्फ और सिर्फ साधन प्रस्तुत किये जाते है और
साध्य को पूरे दृश्य से बाहर रखा जाता है या फिर प्रयास किया जाता है कि व्यक्ति उसे भूल
जाए ।
स्थितियां चेतावनी अवश्य देती है परन्तु पूर्णतया निराशाजनक भी नहीं है ।उपभोक्तावाद
का यह मायावी चरित्र अभी ऊपरी तौर पर ही उभर पाया है व्यक्तिगत जवाबदेही और नैतिकता
आज भी अपनी उपस्थति दर्ज कराती है । इसके पीछे मूलकारण भारतीय समाज में निहित
परिवार के प्रति आस्था और आध्यात्म की भावना है । पाश्चात्य उपभोक्तावाद प्राच्य भारतीयता
के साथ संतुलन साधने को बाध्य है , यह हमारी संस्कृति की मजबूती का प्रमाण और हमारी
संयोजनशीलता और ग्रहणशीलाता का धोतक है ।
वास्तव में यदि इस संक्रमण से विजयी हो कर बाहर निकलना है तो हमें ऐसी वैश्विक संस्कृति
निर्मित करनी होगी जो सही अर्थो में मानवीय वा अंतर्राष्ट्रीय हो ( यधपि हम उससे पूर्व परिचित
है उसे नए रूप में ढलना भर है ) या फिर एक ऐसी प्रतिसंस्कृति निर्मित करनी होगी जो हमारी
परम्पराओं और आधुनिकता को साथ - साथ जीवित रखे । शायद वह प्रति संस्कृति निर्माण की
प्रक्रिया में हो ।
( समाप्त )