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रविवार, 15 जनवरी 2012

संस्कृति , प्रतिसंस्कृति और अपसंस्कृति - २

सांस्कृतिक  मिलन की यह निरंतर प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से चलती ही रहती है , परन्तु यदि इसे बलात् बाधित किया जाय या रोकने का प्रयास  किया जाय तो इसके परिणाम विध्वंसात्मक होते है | भारत में
मध्यकाल में कुछ ऐसा ही दृश्य उपस्थित हुआ | प्रारम्भ में जब इस्लाम ने भारत में कदम रखे तो एक
रोचक दृश्य उत्पन्न हुआ | यह संसार की प्राचीनतम  और नवीनतम संस्कृतियों का एक दूसरे से प्रथम मिलन
  था  जिन्हें  आगे  चल कर एक - दूसरे के साथ - साथ  रहना था | एक  बार  पुन संलयन  की प्रक्रिया प्रारम्भ  हुई , सूफी  मत  का  आगमन ( जिसका  मूल तो  मध्य  एशिया था पर  भारत में उसका एक सर्वथा नवीन
संस्करण दिखाई दिया )  , ताजिया निकालने की परंपरा  ( जो सिर्फ भारतीय उपमहाव्दीप की विशेषता है |)
आदि  तथ्य  इस  बात  की  पुष्टि करते है | अकबर की सुलह कुल नीति और दीन ए इलाही धर्म इसी प्रक्रिया का स्वाभाविक परिणाम  थी | दुर्भाग्यवश  यह  प्रक्रिया  आगे चल कर बाधित कर  दी  गयी | दारा  शिकोह
और  औरंगजेब का  सत्ता  संघर्ष  इसी  बाधित  किये  जाने  की प्रक्रिया का  प्रतीक  कहा  जा  सकता  है |
दारा जहाँ सांस्कृतिक  संलयन का  प्रतीक था  वही औरंगजेब  रुढ़िवाद  का और  दुर्भाग्यवश  रुढ़िवाद की
विजय हुई | संलयन की प्रक्रिया  बलात्  बाधित की गयी , इससे एक अपसंस्कृति  का  उदय हुआ जिसका
चरमोत्कर्ष  अंततः  हम  भारत  के  विभाजन  के रूप में  देख  सकते  है | यह  अकस्मात्  नहीं  कि शेख
सरहिन्दी  जो   एक  शुद्धतावादी  नेता  था  का  नाती  औरंगजेब का  आध्यात्मिक  मार्गदर्शक  था  और
पाकिस्तान  के  दार्शनिक  प्रणेता  मुहम्मद  इकबाल  का  गुरु  भी  सरहिन्दी  की  ही परंपरा  का था |

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