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रविवार, 22 जनवरी 2012

संस्कृति ,प्रतिसंस्कृति और अपसंस्कृति - ३

अंग्रेजो और भारतीयों में हुए इस एकतरफ़ा संपर्क का परिणाम भारतीयों में आत्महीनता के भाव के उदित होने के रूप में हुआ यधपि लाभ भी हुए इसमें संदेह नहीं है। भारतीय पुनर्जागरण के प्रतीक पुरुष राजा राम मोहन राय बेन्थम के उपयोगितावाद से प्रभावित  रहे जबकि आधुनिक भारत के राज
नेताओं की पहली पीढ़ी अंग्रेजो की स्तुति करते हुए दिखाई देती है । भारतीय और आंग्ल संस्कृति के सबसे
सच्चे और आदर्श उदाहरण के रूप में गाँधी जी को देखा जा सकता है । थोरो , तालस्ताय   के दर्शन , रस्किन
की प्रसिद्ध पुस्तक अन टू द लास्ट तथा बाइबिल के अध्याय सरमन   आफ  द माउंट के साथ   गीता ,
उपनिषदों , जैन  वा  बौद्ध  शिक्षाओं  और   राम  चरित्र  का  उन  पर   कैसा  और  क्या  प्रभाव  पड़ा  इसे  बताने  की  आवश्यकता नहीं है ।


                             स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय जनमानस दोहरी आकान्क्षाओ के साथ आगे बढना चाह रहा था । एक तरफ वह भौतिक रूप से समृद्ध होना चाह रहा था तो दूसरी ओर विश्व गुरु कि
छवि को जीवित  रखते  हुए दुनिया को आगे का रास्ता दिखाने का कार्य भी करना चाह रहा था । १९६७ ई॰ तक की नेहरुवादी नीतियाँ इसी भाव को परिलक्षित कर रही थी । जहाँ एक ओर भाखड़ा
और भिलाई  जैसे  कारखाने  बनाये जा रहे थे और  उन्हें  आधुनिकता के  मंदिर  करार  दिया जा रहा था
वही  दूसरी ओर  अंतर्राष्ट्रीय  स्तर पर  पंचशील  का  अनुशीलन  किया  जा रहा  था  जो   प्राचीन   भारत
के   विचारों  को  स्वयं  में   समोए  हुए  थी  और  उसी  का   प्रतिनिधित्व  करती  थी । गुटनिरपेक्षता  की
नीति    कहीं   न   कहीं  विश्व  गुरु की छवि को जीवित  रखने   का   प्रयास  थी । इस  सारे  परिदृश्य में
राष्ट्रीय  आन्दोलन   से  सम्बद्ध एक  वर्ग  ऐसा  भी था जो   इन स्थितियो  को  अपने  आदर्शो  के  मुताबिक
नहीं पा रहा था ।   उसकी   दृष्टि  में  स्वराज तो   मिल   गया  था पर   सुराज   का   आगमन  अभी  तक  नहीं  हो  पाया  था  ।  जे ॰पी॰ , बिनोबा  और  लोहिया  आदि  इसी  वर्ग से  सम्बन्धित थे ।

         इस  तरह  नया  भारत  दो  संस्कृतियों  के  बीच  बँटा  हुआ  था । एक  वर्ग  आधुनिकता  और परंपरा 
का  मेल  चाहता  था  तो  दूसरा  आधुनिकता  की  कीमत  पर  भी  परंपरा  को  जीवित  रखना चाहता था । बाद  में  सर्वोदय  आन्दोलन  और  भूदान  आदि  के  असफल   हो  जाने  से  यह  सिद्ध  हो गया कि  नए  भारत  ने  पहले  रास्ते  को  स्वीकार  कर  लिया  है ।  किन्तु   इस रास्ते में भटकाव  की    संभावना 
अधिक  थी   क्योकि    संतुलन   का   रास्ता  संन्यास  से  अधिक   कठिन  होता  है।इससे एक ऐसी पीढ़ी
तैयार  हुई  जो छद्म जीवन जीती थी , जो  करती  कुछ  थी और  दिखाती  कुछ और थी ।  इस तरह एक 
कचरा   संस्कृति  निर्मित  होने  लगी  । यह  सपूर्ण  स्थिति   भारतीय  दुविधा को  दिखा  रही  थी  कि वह 
किस  और  जाए  और  कौन  सा  रास्ता  चुने ?   
                                                                                                              ( शेष अगले अंक में )             

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