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मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

पब्लिक मैन्ड़ेट से सेन्स आफ द हाउस तक -१

इतिहास गवाह है कि कोई भी आन्दोलन जिसमे एक निश्चित स्तर तक जनसहभागिता दिखाई  देती हो   , अपने अंतिम निष्कर्ष में ना तो पूर्णतया सफल  कहा  जा सकता  है और ना तो पूर्णतया असफल । असल में " जनसहभागिता " का  प्रत्यक्ष  होना  स्वयं में ही इतनी पवित्र  परिघटना  है कि एक बार  उसका उभार हो जाय तो  वह व्यवस्था पर कुछ न कुछ सकारात्मक प्रभाव अवश्य छोड़ जाती है ।

  इस  दृष्टिकोण  से देखा जाय तो अन्ना हजारे द्वारा छेड़े गये आन्दोलन ने अभी तक कितनी सफलता  अर्जित की और कितनी असफलता यह एक  अलग  प्रश्न है  पर  इतना  तो  निश्चित है  कि  इस  आन्दोलन  ने  भारतीय  राजनीति के सामने  कुछ एसे प्रश्न खड़े कर दिए  है जो अभी तक सतह के भीतर ही दबे हुए थे और  अपने नग्न स्वरुप में हमारे सामने नहीं आए थे ।

          कुछ ऐसे प्रश्न जिनका सही उत्तर मिल जाने पर हम एक आदर्श लोकतांत्रिक प्रतिमान विकसित कर सकने में सफल हो सकते है पर उत्तर न मिलने की दशा में पतन की ओर भी अग्रसरित हो सकते है ।

आज जो प्रश्न भारतीय राजव्यवस्था के सामने उठ खड़े हुए है वे एक अवधरणा के रूप में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मथने वाले शाश्वत और स्वाभाविक प्रश्न है । ये प्रश्न है - संसदीय संप्रभुता या विधिक संप्रभुता और लोक संप्रभुता के आपसी सम्बन्ध अथवा समन्वय के  , लोक इच्छा और विधिक इच्छा के संतुलन के और वाक् तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमारेखा के । इन प्रश्नों के हल हमारी व्यवस्था को शीघ्रातिशीघ्र खोजने होगे । भारतीय लोकतंत्र का आगामी भविष्य इन्ही प्रश्नों के हल पर निर्भर करता है ।

पिछले एक वर्ष से हम ये लगातार सुनते आ रहे है कि क़ानून  बनाना अंततः संसद का काम है उसे अपना काम करने  दिया  जाय , विधायिका पर अनावश्यक दबाव डालना उचित नहीं है , संसद विधियों के निर्माण का काम सड़क पर बैठे कुछ लोगों के इशारे पर नहीं करेगी - आदि , आदि ।

संसदीय संप्रभुता का पूर्ण सम्मान करते हुए भी मे यह कहना चाहूँगा कि ऐसी बात करने वाले संभवतः संसदीय लोकतंत्र को पाँच वर्ष की व्यभिचारिता समझने की भूल  कर रहे है |  (जैसा कि लास्की ने अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली के विषय में कहा था । )   संभवतः अमेरिकी प्रणाली से अत्यधिक प्रभावित हमारे शाशकगण यह नहीं समझ पा रहे है कि संसदीय प्रणाली और अध्यक्षीय प्रणाली में बहुत अंतर है और प्रथम द्वितीय से अधिक लोकतांत्रिक होती है ।   यहाँ संसद का यह मतलब नहीं होता है कि पांच वर्ष तक  सांसदों या सरकार को जो चाहे वो करने की छूट दे दी जाय अथवा सत्ता बनाए रखने की चालों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया कहने की सुविधा प्रदान कर दी जाय । उसे हर हालत में लोक संप्रभुता का सम्मान  करना ही होगा । शायद लोहिया ने इसी तथ्य को ध्यान में रख कर कहा था कि "ज़िंदा कौमे पांच साल तक इन्तजार नहीं करती । "

निश्चित रूप से वैधानिक संप्रभुता या व्यवहारिक रूप से संसदीय संप्रभुता (जिसे क़ानून बनाने , उसमे संशोधन करने या उसे रद्द करने का अधिकार हो ) एक सुस्थापित और मान्य सिद्धांत है परन्तु संसदीय लोकतंत्र का अनुसरण करने वाले देश होने के नाते हमें यह नही भूलना चाहिये कि वैधानिक या कानूनी संप्रभुता के पीछे लोक संप्रभुता (जिसे लोक नियंत्रण कहना अधिक व्यवहारिक होगा ) भी होती है जिसके आगे कानूनी संप्रभुता को भी नतमस्तक होना पड़ता है जैसा कि प्रसिद्ध राजनीतिवैज्ञानिक गार्नर ने कहा था - " कानूनी प्रभुसत्ता के पीछे एक दूसरी प्रभुसत्ता भी है जो कि कानूनी रूप से  अज्ञात  और  असंगठित  है  और  जिसमे  इतनी  शक्ति  नहीं  होती  कि  अपनी  हर  इच्छा  को  क़ानून के रूप में  व्यक्त  कर  सके  परन्तु  फिर भी  वह   ऐसी सत्ता है जिसके आगे कानूनी  संप्रभु  को  भी  सर  झुकाना  पड़ता  है । "  भारत  का संविधान जब  अपनी प्रस्तावना में यह कहता है कि "हम भारत के लोग .......................... इस संविधान को अंगीकृत , अधिनियमित और आत्मार्पित करते है " तो उस का तात्पर्य लोक संप्रभुता से ही होता है  ।

व्यवहारतः यह  कहा  जा  सकता है कि लोक  संप्रभुता   का  मतलब     शांति   के  समय   लोकमत  और  संक्रमण  काल  में क्रान्ति  होता है ।

यहाँ  पर  कहा  जा  सकता  है  कि  यह  कैसे  मान लिया जाय  कि   अन्ना   और   उनकी  टीम   लोक संप्रभुता  या लोक नियंत्रण  की संवाहक   है । परन्तु   यदि  अन्ना  के नेतृत्व  वाला नागरिक  समाज  लोक संप्रभुता  का  वाहक  नहीं  है  तो  यह  भी  पता लगाना होगा  कि   लोक सत्ता कहाँ से निःसृत  हो रही है । यह भी  ध्यान  रखना होगा कि लोक  इच्छा  वास्तव  में  जनसंख्या   ( Population )   की नहीं  जनता  ( People ) की  इच्छा  होती  है । यहाँ  जनता का अर्थ  है न्यायोचित  सिद्धांतो   के अनुसार  कार्यो  की पूर्ति में लगी हुई जनता ।  संख्या बल  यहाँ विशेष  महत्व नहीं रखता ।  तभी तो एक  समय था जब  राजग  की प्रथम  सरकार के पतन के समय इसी संसद ने  " पब्लिक मैंन्ड़ेट "  का मुहाविरा दिया था पर आज वही संसद " सेन्स  ऑफ़ द हाउस " की बात करती है । 

वास्तव  में  लोक संप्रभुता की धारणा एक अमूर्त धारणा है और स्वयं को अभिव्यक्त करने के    लिए  उसे  एक  चेहरे  की  आवश्यकता  होती है  और यदि वह  चेहरा अन्ना नहीं है तो क्यों  माननीय  प्रधानमंत्री ने  उन्हें  लिखित  आश्वासन  दिया  और  क्यों   उनकी  माँगो  पर  विचार  करने  के  लिए  संसद  का विशेष सत्र चलाया गया ।  अन्ना को   वैधता और  मान्यता तो  स्वयं  सरकार ने  दी  है और  वह  भी  सहज  रूप  में नहीं बल्कि  मोल - भाव  कर के ,  जन दबाव  के कारण ।

सच  कहे  तो  यह  पता लगाना किसी लोकतांत्रिक  सरकार और  उसके  नुमाइंदो  के  विवेक  पर है कि  वे  जाने कि लोक इच्छा  कहाँ  से और  कैसे   निःसृत हो रही है और  यदि वे इसका  पता लगाने में सफल  हो जाते है तो लोकतंत्र  का सही  स्वरुप  निखर  कर सामने  आता है ।

अन्ना और उनकी टीम  जनइच्छा की प्रतीक  भर है और  वह  इच्छा सही  और कठोर  लोकपाल  क़ानून के निर्माण के पक्ष  में है ।  ना तो अन्ना और  ना ही  जनता संसद  के खिलाफ है पर मौजूदा संदर्भो में वह उसके साथ  भी  नहीं है । सरकार  और  संसद  को  जनता द्वारा  प्रत्यक्ष रूप से वैधता दी गयी है पर वह मौजूदा व्यवस्था से खुश नहीं है । उसे लगता है कि राजनेताओं  में से अधिकाँश ने अपना एक अलग वर्ग बना लिया है और वे परस्पर दुरभिसंधि कर के एक दूसरे की रक्षा का कार्य कर रहे  है  ठीक उसी प्रकार जैसे  बड़े व्यापारी  आपसी समझौता कर एकाधिकार स्थापित कर लिया करते है ।  इस दुरभिसंधि के  खिलाफ  जनता को एक  नायक  की तलाश  है । यदि  मौजूदा राजनीतिक  संवर्ग   से कोई  व्यक्ति  इस हेतु  सामने आता तो  जाति, धर्म और वर्ग  की सीमाओं  से परे  उसे अपार जनसमर्थन  प्राप्त होगा अन्यथा  जिस  सीमा तक  अन्ना और  उनकी टीम  अपनी  शुचिता  बनाए रखती  है  उसे जनसमर्थन प्राप्त करने से कोई शक्ति  नहीं रोक  सकती ।

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