वह किरीट जो दमक रहा है ,
इस किरीट की छवि के भीतर ,
कितने काले सन्नाटे हैं ,
क्या क्या घाते प्रतिघाते हैं ।
कितनी प्रकट वासनाओं के,
आवेदन हैं प्रतिवेदन हैं ,
कितनी नग्न कामनाओं के
कुत्सित , कुंठित उन्मोचन है ।
कितनी खण्डित प्रतिमाओ की ,
छवियाँ उन्मीलित है इसमें ,
कितने छद्म मारतन्ड़ो की ,
गरिमा भूलुंठित है इसमें ।
वह महान मस्तक जिस पर यह ,
मुकुट अधतन चमक रहा है ,
अन्दर ही अन्दर शायद वह ,
इच्छाओं से धधक रहा है ।
किन्तु सार्थकता ही उसकी ,
इस जलने तपने से निर्मित ,
है अस्तित्व सदा ही उसका ,
उसके रक्त स्वेद से निर्मित ।
इस किरीट की छवि के भीतर ,
कितने काले सन्नाटे हैं ,
क्या क्या घाते प्रतिघाते हैं ।
कितनी प्रकट वासनाओं के,
आवेदन हैं प्रतिवेदन हैं ,
कितनी नग्न कामनाओं के
कुत्सित , कुंठित उन्मोचन है ।
कितनी खण्डित प्रतिमाओ की ,
छवियाँ उन्मीलित है इसमें ,
कितने छद्म मारतन्ड़ो की ,
गरिमा भूलुंठित है इसमें ।
वह महान मस्तक जिस पर यह ,
मुकुट अधतन चमक रहा है ,
अन्दर ही अन्दर शायद वह ,
इच्छाओं से धधक रहा है ।
किन्तु सार्थकता ही उसकी ,
इस जलने तपने से निर्मित ,
है अस्तित्व सदा ही उसका ,
उसके रक्त स्वेद से निर्मित ।
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