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रविवार, 18 मार्च 2012

मैं अकेला !

मै अकेला कर रहा संघर्ष अविरल ,
समय से संघर्ष मेरा ,
सत्य है आदर्श मेरा ,
दूर से जो बह रही पुरवा हवा है ,
मूल ही उसका बना गंतव्य मेरा ।

                
                साक्षी इस द्वन्द की सारी धरा है ,
                 स्वेद से मेरे नहाई दस दिशा है ,
                 दे रहा हूँ हवि मै अपने रक्त की खुद ,
                 यज्ञ की वेदी बना कर देह सारी ,
                 और इसमें प्रज्जवलित जो हो रही है ,
                 मर्त्य नर के जन्म की पूँजी है सारी ।


देह में जो वाहि मेरे जल रही है ,
एक दिन सारा भुवन इसमें जलेगा ,
सामने जो दिख रहा फैला अन्धेरा ,
इस हुतासन की प्रभा में जल उठेगा ।


आज जो ये व्योम रक्तिम दिख रहा है ,
रक्त से मेरे रंगा है , मेरा ही लहू है ,
और जब ये मेघ बरसेगे कभी तो ,
रक्त ही मेरा धरा सिंचित करेगा ।   

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