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बुधवार, 14 मार्च 2012

इतिहास जो बन ना सका ..........

"सत्ता भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूर्णतया भ्रष्ट करती है" - पिछले पांच सालो में उत्तर प्रदेश की मायावती अलेक्स्जेंदर पोप  के इस सुप्रसिध्द कथन की सटीक शहादत देती हुई नजर आयीं । यधपि उन्हें जो अवसर प्राप्त हुआ था वह स्वतंत्र भारत के राजनितिक इतिहास में दुर्लभ था । दलित राजनीति का प्रारम्भ वैसे तो जस्टिस पार्टी के उदय के साथ दक्षिण में हुआ था पर दलितों को सत्ता में आने का ऐसा सुयोग उत्तर में ही प्राप्त हुआ । परन्तु मायावती इस महान सुअवसर का लाभ उठा पाने से फिलहाल चूक गयीं है । सर्वसमाज का उनका नया नारा वास्तव में सत्ता प्राप्ति के लिए बनाए गए अवसरवादी गठबंधन के अतिरिक्त और कुछ साबित नही हुआ ।

                                 किन्तु अवसरवाद के कलंक को ढ़ोती हुई , यू . पी . की राजनीति में हाल तक बहु - प्रचलित रही , इस शब्दावली पर यदि गहनतापूर्वक विचार किया जाय तो अपने आप में  यह एक क्रांतिकारी अवधारणा है पर जिस प्रकार भारतीय राजनीति में भगवा और धर्मनिरपेक्ष आदि शब्द रूढ़ हो चुके है और अपने वास्तविक अर्थो को लगभग खो चुके है - कुछ वैसा ही हाल इस शब्द का भी हो गया है।  अब इसका ध्वनित अर्थ कुछ और है और अन्तर्निहित अर्थ कुछ और अन्यथा यह शब्द सामाजिक गतिशीलता को एक नया रूप दे पाने में समर्थ था । दलित वर्ग द्वारा सत्ता का सूत्र अपने हाथ में रख कर द्विज जातियों को दिशा देना - यह कल्पना ही अपने आप में क्रांतिकारी और अभूतपूर्व थी जिसे सकारात्मक दिशा में  और आगे बढाया जाना  चाहिये था किन्तु संस्थानिक भ्रष्टाचार और व्यक्तिगत सनक ने इसे  पूरी  तरह  निगल  लिया।

             वास्तव में सर्वसमाज की इस कल्पना को साकार रूप देने के लिए इतिहास की शव-साधना से मुक्त होने की जरुरत थी । उदारता और  इच्छा शक्ति का उचित मात्रा में संयोजन ही किसी भी राजनितिक व्यक्तित्व  को महान की श्रेणी में ला खडा करता है पर मायावती के व्यक्तित्व में प्रथम गुण का पूरी  तरह आभाव दिखाई दिया ।

            वह दल जो सत्ता के विकेंद्रीकरण के स्वप्न को ले कर खडा हुआ था सत्ता के केन्द्रीयकरण के कारण  भ्रष्टाचार   के  मायाजाल में उलझ कर रह गया । वास्तव में  किसी  भी  प्रकार  की  राजनीति  और विशेष  रूप  से  दलित  राजनीति  का  मार्ग  राजनितिक  उदारता के मार्ग के समांतर हो कर  गुजरता है ,  क्योकि सत्ता   प्राप्ति  के    बाद  दलितों   में  प्रदर्शनात्मक प्रवृत्ति का जन्म ले लेना अत्यंत स्वाभाविक  है और  यह  नेतृत्व  का  कार्य  है  कि  वह  सत्ता  के प्रतिष्ठान  को प्रदर्शनात्मक  प्रवृति से बचाए रखे ।

      जाति की समस्या का सही  इलाज जाति के विरोध की राजनीति में नहीं अपितु   जातीय  समरसता की राजनीति में है  ,  समरसता आ  जाने  पर  जाति  स्वयं  ही विलीनीकरण की दिशा में बढ़ने  लगेगी , पर क्या  हमारी  राजनितिक  व्यवस्था  ने सचेतन  रूप  से दिशा में कोई  कार्यक्रम  जैसे अंतरजातीय  विवाह  को  प्रोत्साहन  ,  सहभोज  आदि  प्रारम्भ  किया ,  शायद   नहीं ।  इसके विपरीत स्थिति  में  जातिगत  विभेद  को बनाए  रखना  ही  राजनितिक  सफलता की कुंजी बन जाती है । परिणामतः सामाजिक स्तर  पर  तो  यह  विभेद  कम  होता दिखाई  देता है पर   राजनीतिक  स्तर पर उत्तरोत्तर बढ़ता  ही जाता  है ।

              ध्यान  रहे  एक   बार सत्ता पा जाने पर दलित  वर्ग  तकनीकी रूप  से दलित   नही रह  जाता बल्कि  समर्थ  हो  जाता है ,  वह  सत्ता  का अधिष्ठाता हो  जाता है और  उसे  अपना  व्यवहार  भी  इसी के अनुरूप  नियोजित  करना  चाहिये  ,  तब  दलितों  को  स्वयम   को वंचित  वर्ग से जोड़ लेना चाहिये क्योकि सत्ता प्राप्ति के बाद उसे स्थायी  बनाए रखना अगला कार्य होता है और केवल  सहमति ही है जो  लोक तंत्र में सत्ता को स्थायी बनाने का कार्य  करती  है अन्यथा जनता भ्रष्टाचार के उस केंद्र को चुन लेगी जिसका भ्रष्टाचार उसे  तात्कालिक रूप से उसे अप ने अधिक अनुकूल  लगता है और यही हुआ भी । 

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