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रविवार, 12 फ़रवरी 2012

भारतीय पतन का प्रस्थानबिन्दु - १

मिनिर्वा में उल्लू तभी उड़ाते है जब रात गहरा जाती है , हाल के दिनों में भारतीय आकाश में भी एसेही उल्लू उड़ते हुए दिखाई दे रहे है । घटनाओं की एक लम्बी श्रृखला है जो बढ़ते हुए जन असंतोष   की ओर संकेत कर रही है। एम्स के छात्रों का आरक्षण के विरुद्ध आन्दोलन      , जेसिका  लाल  हत्याकांड   में   आए  फैसले के विरुद्ध  जनता  की तीव्र प्रतिक्रिया ,  मुंबई  हमले  के  बाद  व्यवस्था के खिलाफ  फैला जनाक्रोश , पश्चिम  बंगाल  का  सिंगूर  आन्दोलन   और  सबसे  बढ़  कर अन्ना  हजारे  के नेतृत्व में उठा जनलोकपाल आन्दोलन ,  सारी की सारी  घटनाएं  एक सामान्य तथ्य- व्यवस्था के प्रति जनता के मोहभंग को प्रदर्शित कर रही है ।        
              मार्क्सवादी  तर्क   का  उपयोग   करे    तो  कह   सकते  है कि पानी  अभी  उबल  रहा  है  पर सौ डिगरी सेंटीग्रेट  पर  पहुचते ही भाप बन  कर उड़ जाएगा  । जनता द्वारा स्वेच्छा से दी जाने  वाली  राजनीतिक वैधता ही है जो  किसी  भी राजनीतिक व्यवस्था को  गतिशील  बनाती  है पर जैस़ा की हाल के दिनों में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव  बान की मून  ने कहा था कि विश्व की राजनीतिक व्यवस्थाओ के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट विश्वसनीयता बनाए रखने का है । राजनीतिक विश्वसनीयता के इस महान संकट से भारत भी  अछूता नहीं है। " सारे नेता चोर है "- यह भावना आम भारतीय के मन में घर करती जा रही है पर खेद की बात है कि मुख्य धारा का कोई भी दल इस तथ्य को सही  और जनतांत्रिक अर्थो में समझने को तैयार नही दिखता । 

                  भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के समक्ष इस समय यक्ष प्रश्न यह है कि वह जनता के मध्य अपनी साख को किस प्रकार बचाए ? वास्तविकता तो यह है कि सामान्य रूप से भारतीय राजनेताओं ने अपना एक अलग सामाजिक राजनितिक वर्ग बना लिया है जिसका हित जनता के हितो से पूर्णतया अलग है । भारत में परेतो , मोस्का  आदि विशिष्टवर्गवादियों की यह समझ काफी हद तक सत्य होती दिखाई देती है कि लोकतंत्र में भी सत्ता कुछ गिने चुने विशिष्ट वर्गों तक ही सीमित  रहती है ।

आखिर क्यों हमारा जनतंत्र अरस्तू द्वारा वर्णित भीड़तंत्र में परिवर्तित हो गया या होता जा रहा है ? यदि ध्यान पूर्वक देखे तो भारतीय राजनीति की इस दुर्दशा के लिए भारतीय समाज भी  कम उत्तरदायी नहीं है ।हमारा राजनीतिक परिसर हमारे सामाजिक परिसर से अलग नहीं हो सकता ।
 आदर्श  स्थति में  समाज को यह निर्देशित  करना चाहिये  कि राजनीति  क्या करे ?
पर यहाँ तो  राजनीति समाज को निर्देशित करती दिखाई  दे  रही है और वह भी सत्ता  की पूरी
धमक  और अहंकार  के साथ । कभी  -  कभी  तो  ऐसा  लगता है कि  भारतीय समाज अपनी
निर्देशन क्षमता पूरी  तरह  खो  चुका  है । याद  करे ,  आज  के पच्चीस - तीस  वर्ष  पूर्व  हमारे
गाँवो  में यदि  कोई ह्त्या या जार कर्म जैसे अपराध  करता  था तो  उसका  सामाजिक बहिष्कार
कर  दिया जाता था पर  आज की स्थति इसकी ठीक उल्टी है ।सत्ता के चरण -  चुम्बन  की
प्रवृत्ति  सर्वत्र व्याप्त दिखायी देती है ,  सफलता किसी भी  कीमत  पर  हमारा  मूल -  मंत्र बन
चुका है । साध्य और साधन  का सिद्धांत  गांधी   के अपने  भारत  में  कूड़ेदान  की  वस्तु   बन
चुका है ।  ऐसे लोग  जिन्हें  कभी समाज बहिष्कृत  कर  गाव  के  बाहर  रहने  को  बाध्य  कर
दिया करता था आज भारत की ह्रदय  स्थली  दिल्ली में  संसद  में  बैठने  को प्रयासरत दिखाई
देते है । सच तो यह है कि ऐसे लोगों में  यह हिम्मत  ही नहीं  पैदा होनी  चाहिये थी ।

         भारतीय  समाज  के पराभव से भारतीय  राजव्यवस्था   की क्षरणशीलता  के  इस  निष्कर्ष
पर  पहुचते   ही  दूसरा  प्रश्न  उठ खडा  होता  है    कि  आखिर  यह  स्थिति  पैदा  क्यों  हुई ।  यदि
ध्यानपूर्वक  देखा  जाय   तो भारतीय  समाज  में  दिख  रही यह  कमजोरी  आजादी  के  बाद  कुछ 
जादा ही बलवती हुई  है । हम यह तो नही कह सकते कि इसके  पूर्व   भारतीय  समाज  अपने
आदर्श    स्वरुप  में  था क्योकि यदि ऐसा  होता तो  राष्ट्र को  पराधीनता का इतना लंबा दुस्वप्न
ना झेलना पड़ता  परन्तु  यह अवश्य कहा जा  सकता है  कि इसके    पूर्व  हमारा  समाज अपने प्रभु वर्ग की अपेक्षा मूल्यों के प्रति अधिक सचेत था तथापि तब वेह अपने शाशको को अधिक प्रभावित नही कर पाता था    किन्तु   राष्ट्रीय  आन्दोलन  की पृष्ठभूमि  में जनता पर्याप्त रूप से सचेत हुई और स्वतन्त्रता के उपरान्त लोकतंत्र को स्वीकार करने के कारण वह राज्य को प्रभावित करने की स्थिति में भी आ गयी ।


      दुर्भाग्य  की बात है  कि स्वतन्त्रता के  बाद हम इस सुअवसर का लाभ नहीं उठा सके ,  लोक   को
 जिस  सीमा तक  तंत्र  को प्रभावित  या निर्देशित  करना  चाहिये था वह  नहीं कर सका और लोकतंत्र  का विकास  अपने  सकारात्मक  स्वरुप  में  नहीं  हो  पाया । इसका   मूलकारण   था   स्वयं   भारतीय समाज का ही पतोन्मुख हो जाना । हम लोकतंत्र में निहित लोक और तंत्र के अन्न्योंनाश्रित सम्बन्ध को आत्मसात कर पाने में असफल रहे ।

                                                                                                      (  शेष अगले अंक में )

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