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रविवार, 25 मार्च 2012

आरोहण

वह किरीट जो दमक रहा है ,
  इस किरीट की छवि के भीतर ,
कितने  काले सन्नाटे  हैं ,
  क्या क्या घाते प्रतिघाते हैं ।

              कितनी प्रकट वासनाओं  के,
               आवेदन हैं प्रतिवेदन हैं ,
             कितनी नग्न कामनाओं के 
                 कुत्सित , कुंठित उन्मोचन है ।

कितनी खण्डित प्रतिमाओ की ,
 छवियाँ उन्मीलित है इसमें ,
कितने छद्म मारतन्ड़ो की ,
  गरिमा भूलुंठित  है इसमें ।

              वह महान मस्तक जिस पर यह ,
                मुकुट अधतन चमक रहा है ,
             अन्दर ही अन्दर शायद वह ,
               इच्छाओं से धधक रहा है ।

किन्तु सार्थकता ही उसकी ,
 इस जलने तपने से निर्मित ,
है अस्तित्व सदा ही उसका  ,
  उसके रक्त स्वेद से निर्मित ।
   

सोमवार, 19 मार्च 2012

भारतीय पतन का प्रस्थान बिन्दु -२

भारतीय समाज आज अधिकांश रूप से अपनी नियंत्रण क्षमता का परित्याग कर चुका है।
हाल के तीन - चार दशको में हमें विशेष रूप से क्षरणशील होते हुए देखा गया है । राष्ट्रकवि
मैथलीशरण गुप्त के शब्दों में कहे तो - " हम कौन थे , क्या हो गए , और होगे क्या अभी ?"
भारतीय मानस इस पतन शील दशा में क्यों पहुँच गया यह प्रश्न विशेष रूप से विचारणीय
है । यह प्रश्न आत्महीनता का नहीं अपितु आत्मविश्लेषण का है और समकालीन दशाओं
में अनिवार्य रूप से विचारणीय है जिससे चाह कर भी बचा नहीं जा सकता है ।

          कहा जाता है कि " इतिहास अपनी तात्कालिकता में हमेशा शाश्वत होता है । " पंडित
नेहरु को  लिखे  अपने एक  पत्र में के एम मुंशी ने लिखा था - " भविष्य को ध्यान में रख कर
वर्तमान में कार्य करने की शक्ति मुझे अतीत के प्रति अपने विश्वास से ही मिली है । " व्यक्ति
की तरह समाज भी अपने इतिहास का भोक्ता या शिकार होता है । संकट की घडी में कई बार
हमें अपने इतिहास से ही शक्ति और समाधान दोनों  प्राप्त होते है ।तो तात्कालिक प्रश्न को
ध्यान में रख कर जब हम इतिहास की वीथिका में झाँकते है तो पता चलता है कि  राष्ट्रपिता
महत्मा गाँधी को आने वाले इस संकट का पूर्वाभास बहुत पहले ही हो गया था और संकेतो में ही
उन्होंने इस समस्या का समाधान भी सुझाया था , बापू लिखते है -
         
         " भारत के सामने इस समय अपनी आत्मा को खोने का ख़तरा है और यह संभव नहीं
           नहीं है कि अपनी आत्मा को खो कर वह जीवित रह सके । इसमें अपना शुद्ध और
           चेतन्य स्वरूप प्रकट करने की सहज  क्षमता अभी भी है । भारत ने आत्म शुद्धि के
           लिए  स्वेच्छा पूर्वक जैसा प्रयास किया है  उसका दुनिया में दूसरा कोई  उदाहरण नहीं
           मिलता ....................केवल भारत ही कर्म भूमि है अन्य सभी भोग भूमि हैं ।भारत
           यूरोप , जापान या चीन नहीं है ।इसकी नीयति विशिष्ट है । आलसी की तरह लाचारी
           प्रकट करते हुए उसे ऐसा नहीं कहना चाहिये कि पश्चिम की बाढ़ से मैं बच नहीं सकता
           अपनी और दुनिया की  भलाई के लिए उसे इस बाढ़ को रोकने  योग्य  शक्तिशाली
           बनना ही होगा ।यह तपश्चर्या की अमर  भूमि है , इसे अपनी नियति को स्वीकार करना
            ही होगा। "


बापू का यह कथन और उनके इस तरह के विचार परंपरा और आधुनिकता में किसी प्रकार का कोई द्वन्द उपस्थित नहीं करते जेसा कि bahut से लोग समझते है ,  हो सकता है कि आप उनके प्रयोगों से या कार्यनीति से असहमत हो ( यधपि वह एक अलग विषय है )  परन्तु उनके इस विचार की मूल भावना से असहमत होना कठिन है विशेष रूप से भारतीय संदर्भो में। गांधी  से भारतीय  संदर्भो में  गाँधी  भरसक  रूप से  भारतीयों  को  पश्चमी  सभ्यता के उस सर्वग्रासी प्रभाव से बचाना चाहते थे जो लालच और शोषण पर आधारित थी और जिसे वह शेतानी
सभ्यता कह कर पुकारते थे ।


    गांधी से पूर्व स्वामी विवेकानंद ने भी इस संकट को भिन्न स्वरुप में पहचाना था । सेनापति की तरह उन्होंने जनो को एकजुट होकर उठ खड़े हो जाने  के लिए पुकारा  -

              " प्रत्येक राष्ट्र का , प्रत्येक व्यक्ति की भाँति जीवन का एक मूल लक्ष्य होता है ,
                एक केंद्र बनता है , वादी स्वर होता है जिसका अवलंबन कर अन्य स्वर संगीत
                 में संगति पैदा करते है । जो राष्ट्र अपनी राष्ट्रीय  प्राण  शक्ति  को छोड़ना
                  चाहता है , सदियों से प्रवाहित अपनी दिशा को बदलना चाहता है , वह राष्ट्र
                   नष्ट हो जाता है । किसी राष्ट्र की प्राणशक्ति राजनीतिक  शक्ति  है  जैसे
                 इंग्लेंड की, तो किसी की कलात्मक जीवन और किसी की कुछ और । भारत
                 का केंद्र है - धार्मिक जीवन , राष्ट्रीय जीवन संगीत का वही आदि स्वर है ....
                 .......................इसलिए यदि तुम अपने धर्म का त्याग  कर राजनीति और
                 समाज का मार्ग पकड़ोगे ............. तब तुम लुप्त हो जायोगे ........समाज
                 सुधार और राजनीति की शक्षा तुम्हे धर्म के माध्यम से देनी होगी । "



भारतीय समाज के वर्तमान पतन का प्रस्थान बिंदु यही छिपा है । स्वतंत्रता के पश्चात अपनाई
गयी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में हमने कही भी , सच्चाई के  साथ  इस भाव को
सहेजने का प्रयास नहीं किया । भारत की आत्मा को समझे बिना हमने पश्चिमी करण को
ही आधुनिकी करण का पर्याय मान लिया । पश्चिमी संस्थाओं और व्यवस्थाओं को बिना सोचे
समझे भारत की देशी और जातीय परिस्थितियों में घुसेड़ने का प्रयास किया गया , हमने
भारत के मूल भाव को सहेजने वाला कोई समकालीन प्रतिमान स्थापित करने का प्रयास ही
नहीं किया  । आध्यात्मिकता और धार्मिकता को तो संस्थानिक स्तर पर मानो नकारात्मक
शब्द मान लिया गया । वास्तव में यह भारत की आत्मा को नकारने का प्रयास था ।


        हमारा प्रारम्भिक नेतृत्व इस बात को समझने में पूर्णतया असफल रहा कि हम एक
ऐसी व्यवस्था को अपनाने का प्रयास कर रहे है जो हमारी जीवन शैली के  पूर्णतया  विपरीत  है ।
हमारी जीवन शैली सामूहिकता को प्रश्रय देती है जबकि पश्चिमी जीवन शैली वयैक्तिकता
को अपनाती है ।हम , हमारे बिम्ब , हमारे प्रतीक सब कुछ पश्चिम से पूर्णतया अलग रहे है ।मैं
 यहाँ स्व॰  निर्मल वर्मा की कुछ पंक्तियाँ उधृत करना चाहुँगा -

             "  संस्कृति का भारतीय स्वरुप पश्चिम की सास्कृतिक धारा से नितांत भिन्न है ।
                यूरोपीय संस्कृति का आर्भिभाव ही व्यक्ति की विकसित आत्मचेतना से हो
                पाया है । इस आधार पर अकेले व्यक्ति ने यथार्थ का एक निजी , स्वायत्त
                दर्शन   सृजित  किया  है -  एक ऐसा दर्शन जिसकी जड़े , उसके   व्यक्तिगत
                अनुभव में निहित है । दूसरे शब्दों में पश्चिमी संस्कृति का प्रर्दुभाव एक ऐसी
                 खंडित चेतना  में हुआ है , जहाँ मनुष्य अपने को प्रकृति , विश्व और दूसरे मनुष्य से
                 बिलकुल अलग पाता है और उसे अनुभव होता है की इस अलगाव और विभाजन को
                  महज धार्मिक आस्था और परंपरा द्वारा नहीं पाटा जा सकता ।वह महसूस करता है
                  कि धर्म और  परम्परा उसे सांत्वना और  सहारा  तो  दे सकते है , किन्तु   उसके
                   अंदरूनी मर्म की गहरी परतो में नहीं पैठ सकते , जहाँ वह सम्पूर्ण रूप से स्वतंत्र
                    है और अपनी स्वतन्त्रता में सम्पूर्ण रूप से अकेला है । "


इस तरह धर्म पश्चिम के लिए व्यक्तित्व की पूर्णता को प्राप्त करने का एक यन्त्र मात्र है , धर्म उसके
संपूर्ण व्यक्तित्व को पारिभाषित नहीं करता । धर्म ही नहीं यदि परिवार और राज्य जैसी संस्थाये
भी उसके व्यक्तित्व की तथाकथित स्वतन्त्रता के आड़े आती है तो उसे उन्हें उसे भी तिलांन्जलि देने
मे हिचक नहीं होगी । वास्तव मे पश्चिम का व्यक्ति एक भौतिक मानव है आध्यात्मिक मानव नहीं ।
वह स्वयं को ब्रम्हांड की एक पृथक और स्वायत्त इकाई मानता है जिसकी तुलना अन्य  किसी से नहीं
की जा सकती।  पृथक अस्तित्व का यह भाव अपने चरम पर जा कर स्वयं को प्रकृति से भी अलग
समझने लगता है , और उसके भरपूर दोहन में  ही अपने यक्तित्व की सार्थकता मानने लगता है ।
पाश्चात्य सभ्यता भोगवादी है वह प्रकृति के अनुकूल जीने की जगह उसका दोहन करने में विश्वास करती है । दोहन और शोषण पर आधारित भोगवादी पश्चिमी सभ्यता अपना औचित्य
इसाई दर्शन के निम्न सूत्र से ग्रहण करती है -

                  "  तब ईश्वर ने नूह और उसके लड़को को आशीर्वाद दिया - फलदाई बनो ,
                    अपनी संख्या बाढ़ाओं और जमीन पर फैल जाओ । तुम्हारा आतंक जमीन के
                     जानवरों , आसमान के परिंदों , उन सब पर जो भूमि पर चलते है और सागर
                      की मछलियों पर फैल जाएगा , उन सब को तुम्हे सौंप रहा हूँ । जो ज़िंदा
                       है  और चलता है वह सब तुम्हारे खाने के लिए है । जैसे मैने तुम्हे वनस्पति
                       दी है , उसी तरह अब तुम्हे सब कुछ सौंप रहा हूँ । "
                                                                                       ( जेनेसिस ९ : १-३ )

किन्तु भारतीय सभ्यता इस प्रकार का कोई विभाजन नही करती । यहाँ व्यक्ति के भौतिक
अनुभवों और आध्यात्मिक अनुभवों में किसी प्रकार की विभेदक रेखा नहीं खीची गयी है ।
हम अपने सांसारिक अनुभवों को भी धार्मिक प्रतीकों द्वारा अभिव्यक्त करते है । हमारे
धार्मिक अनुष्ठान हमारे सांसारिक जीवन के साथ गहराई से जुड़े रहे है । भारतीय जीवन
दृष्टि भोग को स्वीकार भी  करती है किन्तु उसे शोषण की हद तक ले जाए बिना और संतुलित
मात्रा में । वह भोग को भी त्याग पूर्वक करने का उपदेश देती है और उसकी प्राप्ति हेतु एक
व्यवहारिक आचार संहिता - त्याग ( ब्रह्मचर्य ) , भोग ( गृहस्थ ) , त्याग पूर्वक भोग ( वानप्रस्थ )
और त्याग ( संन्यास ) - भी प्रस्तुत करती है । हमारे जीवन की पूर्णता मोक्ष में निहित है भोग
में नहीं ।


            स्वतंत्रता के पश्चात अपनाई गयी व्यवस्था में हमने उपरोक्त भारतीय आदर्शो की पूर्णतया
अवहेलना कर दी  इससे हमारे जीवन दर्शन और राजनीतिक दर्शन में एक विभेद पैदा होने लगा
वह आध्यात्मिकता जो हमारे समाज को दुष्प्रवृत्तियों  से बचाती थी और नियंत्रण क्षमता प्रदान
करती थी अब एक बाहरी  वस्तु मान ली गयी और हमारा समाज अपनी नियंत्रण क्षमता खो बैठा ।


           यहाँ सवाल दो महान संस्कृतियों की तुलना कर एक को कम और दुसरे को जादा सिद्ध
करने का नहीं है , सवाल है दो भिन्न जीवन दृष्टियों में तुलना करते हुए अपने मूल को ना
छोड़ने  का है और जैसा कि विवेकानंद ने कहा था कि " स्वतन्त्रता आध्यात्मिक प्रगति की
एकमात्र शर्त है और यूरोप ने राजनीतिक क्षेत्र में उसे भारत की तुलना में अधिक प्रभावी
ढंग से जाना है किन्तु आध्यात्मिक जगत में उसे उसने अत्यंत कम ही कल्पित किया है ।"
भारत स्वाधीनता को आध्यात्मिक जगत में कल्पित करता है और उसे सांसारिक  जीवन
में इस तरह पिरोता है कि वह व्यक्ति के सामाजिक अलगाव का साधन ना बन कर उसकी सामाजिक
सम्पूर्णता का प्रतीक बन जाती है । दुःख की बात है कि आज हम अपनी उसी विरासत को छोड़ देने
को उद्धत है जिसे संसार को हमारी सबसे बड़ी देन कहा जा सकता है , और वही हमारे सामाजिक
विखंडन का कारण भी बन रही है , जरुरत उस प्राचीन परम्परा को फिर से संरक्षित करने की
है जिसे हमने सदियों के अनुसंधान के बाद प्राप्त किया था ।
   
                                                                                                           ( समाप्त )

                                               

रविवार, 18 मार्च 2012

मैं अकेला !

मै अकेला कर रहा संघर्ष अविरल ,
समय से संघर्ष मेरा ,
सत्य है आदर्श मेरा ,
दूर से जो बह रही पुरवा हवा है ,
मूल ही उसका बना गंतव्य मेरा ।

                
                साक्षी इस द्वन्द की सारी धरा है ,
                 स्वेद से मेरे नहाई दस दिशा है ,
                 दे रहा हूँ हवि मै अपने रक्त की खुद ,
                 यज्ञ की वेदी बना कर देह सारी ,
                 और इसमें प्रज्जवलित जो हो रही है ,
                 मर्त्य नर के जन्म की पूँजी है सारी ।


देह में जो वाहि मेरे जल रही है ,
एक दिन सारा भुवन इसमें जलेगा ,
सामने जो दिख रहा फैला अन्धेरा ,
इस हुतासन की प्रभा में जल उठेगा ।


आज जो ये व्योम रक्तिम दिख रहा है ,
रक्त से मेरे रंगा है , मेरा ही लहू है ,
और जब ये मेघ बरसेगे कभी तो ,
रक्त ही मेरा धरा सिंचित करेगा ।   

बुधवार, 14 मार्च 2012

इतिहास जो बन ना सका ..........

"सत्ता भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूर्णतया भ्रष्ट करती है" - पिछले पांच सालो में उत्तर प्रदेश की मायावती अलेक्स्जेंदर पोप  के इस सुप्रसिध्द कथन की सटीक शहादत देती हुई नजर आयीं । यधपि उन्हें जो अवसर प्राप्त हुआ था वह स्वतंत्र भारत के राजनितिक इतिहास में दुर्लभ था । दलित राजनीति का प्रारम्भ वैसे तो जस्टिस पार्टी के उदय के साथ दक्षिण में हुआ था पर दलितों को सत्ता में आने का ऐसा सुयोग उत्तर में ही प्राप्त हुआ । परन्तु मायावती इस महान सुअवसर का लाभ उठा पाने से फिलहाल चूक गयीं है । सर्वसमाज का उनका नया नारा वास्तव में सत्ता प्राप्ति के लिए बनाए गए अवसरवादी गठबंधन के अतिरिक्त और कुछ साबित नही हुआ ।

                                 किन्तु अवसरवाद के कलंक को ढ़ोती हुई , यू . पी . की राजनीति में हाल तक बहु - प्रचलित रही , इस शब्दावली पर यदि गहनतापूर्वक विचार किया जाय तो अपने आप में  यह एक क्रांतिकारी अवधारणा है पर जिस प्रकार भारतीय राजनीति में भगवा और धर्मनिरपेक्ष आदि शब्द रूढ़ हो चुके है और अपने वास्तविक अर्थो को लगभग खो चुके है - कुछ वैसा ही हाल इस शब्द का भी हो गया है।  अब इसका ध्वनित अर्थ कुछ और है और अन्तर्निहित अर्थ कुछ और अन्यथा यह शब्द सामाजिक गतिशीलता को एक नया रूप दे पाने में समर्थ था । दलित वर्ग द्वारा सत्ता का सूत्र अपने हाथ में रख कर द्विज जातियों को दिशा देना - यह कल्पना ही अपने आप में क्रांतिकारी और अभूतपूर्व थी जिसे सकारात्मक दिशा में  और आगे बढाया जाना  चाहिये था किन्तु संस्थानिक भ्रष्टाचार और व्यक्तिगत सनक ने इसे  पूरी  तरह  निगल  लिया।

             वास्तव में सर्वसमाज की इस कल्पना को साकार रूप देने के लिए इतिहास की शव-साधना से मुक्त होने की जरुरत थी । उदारता और  इच्छा शक्ति का उचित मात्रा में संयोजन ही किसी भी राजनितिक व्यक्तित्व  को महान की श्रेणी में ला खडा करता है पर मायावती के व्यक्तित्व में प्रथम गुण का पूरी  तरह आभाव दिखाई दिया ।

            वह दल जो सत्ता के विकेंद्रीकरण के स्वप्न को ले कर खडा हुआ था सत्ता के केन्द्रीयकरण के कारण  भ्रष्टाचार   के  मायाजाल में उलझ कर रह गया । वास्तव में  किसी  भी  प्रकार  की  राजनीति  और विशेष  रूप  से  दलित  राजनीति  का  मार्ग  राजनितिक  उदारता के मार्ग के समांतर हो कर  गुजरता है ,  क्योकि सत्ता   प्राप्ति  के    बाद  दलितों   में  प्रदर्शनात्मक प्रवृत्ति का जन्म ले लेना अत्यंत स्वाभाविक  है और  यह  नेतृत्व  का  कार्य  है  कि  वह  सत्ता  के प्रतिष्ठान  को प्रदर्शनात्मक  प्रवृति से बचाए रखे ।

      जाति की समस्या का सही  इलाज जाति के विरोध की राजनीति में नहीं अपितु   जातीय  समरसता की राजनीति में है  ,  समरसता आ  जाने  पर  जाति  स्वयं  ही विलीनीकरण की दिशा में बढ़ने  लगेगी , पर क्या  हमारी  राजनितिक  व्यवस्था  ने सचेतन  रूप  से दिशा में कोई  कार्यक्रम  जैसे अंतरजातीय  विवाह  को  प्रोत्साहन  ,  सहभोज  आदि  प्रारम्भ  किया ,  शायद   नहीं ।  इसके विपरीत स्थिति  में  जातिगत  विभेद  को बनाए  रखना  ही  राजनितिक  सफलता की कुंजी बन जाती है । परिणामतः सामाजिक स्तर  पर  तो  यह  विभेद  कम  होता दिखाई  देता है पर   राजनीतिक  स्तर पर उत्तरोत्तर बढ़ता  ही जाता  है ।

              ध्यान  रहे  एक   बार सत्ता पा जाने पर दलित  वर्ग  तकनीकी रूप  से दलित   नही रह  जाता बल्कि  समर्थ  हो  जाता है ,  वह  सत्ता  का अधिष्ठाता हो  जाता है और  उसे  अपना  व्यवहार  भी  इसी के अनुरूप  नियोजित  करना  चाहिये  ,  तब  दलितों  को  स्वयम   को वंचित  वर्ग से जोड़ लेना चाहिये क्योकि सत्ता प्राप्ति के बाद उसे स्थायी  बनाए रखना अगला कार्य होता है और केवल  सहमति ही है जो  लोक तंत्र में सत्ता को स्थायी बनाने का कार्य  करती  है अन्यथा जनता भ्रष्टाचार के उस केंद्र को चुन लेगी जिसका भ्रष्टाचार उसे  तात्कालिक रूप से उसे अप ने अधिक अनुकूल  लगता है और यही हुआ भी ।