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मंगलवार, 27 नवंबर 2012

आपातकाल -८ : संविधान की नसबंदी

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आपातकाल के दौरान किए गए व्यापक संवैधानिक परिवर्तनों ने

उसके मूलढाँचे को ही खत्म कर दिया था | बाद में आई जनता

सरकार ने ४४वें संशोधन द्वारा मूल स्थिति लौटायी , इस सरकार

का एकमात्र यही कार्य उसकी उपयोगिता सिद्ध कर देता है |

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

बोल कि लब आजाद है !

वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता  किसी  भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी नियामत है ।
क्या वर्तमान भारत में यह पूरी तरह उपलब्ध है ! एक विवेचन !

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

पब्लिक मैन्ड़ेट से सेन्स आफ द हाउस तक -१

इतिहास गवाह है कि कोई भी आन्दोलन जिसमे एक निश्चित स्तर तक जनसहभागिता दिखाई  देती हो   , अपने अंतिम निष्कर्ष में ना तो पूर्णतया सफल  कहा  जा सकता  है और ना तो पूर्णतया असफल । असल में " जनसहभागिता " का  प्रत्यक्ष  होना  स्वयं में ही इतनी पवित्र  परिघटना  है कि एक बार  उसका उभार हो जाय तो  वह व्यवस्था पर कुछ न कुछ सकारात्मक प्रभाव अवश्य छोड़ जाती है ।

  इस  दृष्टिकोण  से देखा जाय तो अन्ना हजारे द्वारा छेड़े गये आन्दोलन ने अभी तक कितनी सफलता  अर्जित की और कितनी असफलता यह एक  अलग  प्रश्न है  पर  इतना  तो  निश्चित है  कि  इस  आन्दोलन  ने  भारतीय  राजनीति के सामने  कुछ एसे प्रश्न खड़े कर दिए  है जो अभी तक सतह के भीतर ही दबे हुए थे और  अपने नग्न स्वरुप में हमारे सामने नहीं आए थे ।

          कुछ ऐसे प्रश्न जिनका सही उत्तर मिल जाने पर हम एक आदर्श लोकतांत्रिक प्रतिमान विकसित कर सकने में सफल हो सकते है पर उत्तर न मिलने की दशा में पतन की ओर भी अग्रसरित हो सकते है ।

आज जो प्रश्न भारतीय राजव्यवस्था के सामने उठ खड़े हुए है वे एक अवधरणा के रूप में लोकतांत्रिक व्यवस्था को मथने वाले शाश्वत और स्वाभाविक प्रश्न है । ये प्रश्न है - संसदीय संप्रभुता या विधिक संप्रभुता और लोक संप्रभुता के आपसी सम्बन्ध अथवा समन्वय के  , लोक इच्छा और विधिक इच्छा के संतुलन के और वाक् तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमारेखा के । इन प्रश्नों के हल हमारी व्यवस्था को शीघ्रातिशीघ्र खोजने होगे । भारतीय लोकतंत्र का आगामी भविष्य इन्ही प्रश्नों के हल पर निर्भर करता है ।

पिछले एक वर्ष से हम ये लगातार सुनते आ रहे है कि क़ानून  बनाना अंततः संसद का काम है उसे अपना काम करने  दिया  जाय , विधायिका पर अनावश्यक दबाव डालना उचित नहीं है , संसद विधियों के निर्माण का काम सड़क पर बैठे कुछ लोगों के इशारे पर नहीं करेगी - आदि , आदि ।

संसदीय संप्रभुता का पूर्ण सम्मान करते हुए भी मे यह कहना चाहूँगा कि ऐसी बात करने वाले संभवतः संसदीय लोकतंत्र को पाँच वर्ष की व्यभिचारिता समझने की भूल  कर रहे है |  (जैसा कि लास्की ने अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली के विषय में कहा था । )   संभवतः अमेरिकी प्रणाली से अत्यधिक प्रभावित हमारे शाशकगण यह नहीं समझ पा रहे है कि संसदीय प्रणाली और अध्यक्षीय प्रणाली में बहुत अंतर है और प्रथम द्वितीय से अधिक लोकतांत्रिक होती है ।   यहाँ संसद का यह मतलब नहीं होता है कि पांच वर्ष तक  सांसदों या सरकार को जो चाहे वो करने की छूट दे दी जाय अथवा सत्ता बनाए रखने की चालों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया कहने की सुविधा प्रदान कर दी जाय । उसे हर हालत में लोक संप्रभुता का सम्मान  करना ही होगा । शायद लोहिया ने इसी तथ्य को ध्यान में रख कर कहा था कि "ज़िंदा कौमे पांच साल तक इन्तजार नहीं करती । "

निश्चित रूप से वैधानिक संप्रभुता या व्यवहारिक रूप से संसदीय संप्रभुता (जिसे क़ानून बनाने , उसमे संशोधन करने या उसे रद्द करने का अधिकार हो ) एक सुस्थापित और मान्य सिद्धांत है परन्तु संसदीय लोकतंत्र का अनुसरण करने वाले देश होने के नाते हमें यह नही भूलना चाहिये कि वैधानिक या कानूनी संप्रभुता के पीछे लोक संप्रभुता (जिसे लोक नियंत्रण कहना अधिक व्यवहारिक होगा ) भी होती है जिसके आगे कानूनी संप्रभुता को भी नतमस्तक होना पड़ता है जैसा कि प्रसिद्ध राजनीतिवैज्ञानिक गार्नर ने कहा था - " कानूनी प्रभुसत्ता के पीछे एक दूसरी प्रभुसत्ता भी है जो कि कानूनी रूप से  अज्ञात  और  असंगठित  है  और  जिसमे  इतनी  शक्ति  नहीं  होती  कि  अपनी  हर  इच्छा  को  क़ानून के रूप में  व्यक्त  कर  सके  परन्तु  फिर भी  वह   ऐसी सत्ता है जिसके आगे कानूनी  संप्रभु  को  भी  सर  झुकाना  पड़ता  है । "  भारत  का संविधान जब  अपनी प्रस्तावना में यह कहता है कि "हम भारत के लोग .......................... इस संविधान को अंगीकृत , अधिनियमित और आत्मार्पित करते है " तो उस का तात्पर्य लोक संप्रभुता से ही होता है  ।

व्यवहारतः यह  कहा  जा  सकता है कि लोक  संप्रभुता   का  मतलब     शांति   के  समय   लोकमत  और  संक्रमण  काल  में क्रान्ति  होता है ।

यहाँ  पर  कहा  जा  सकता  है  कि  यह  कैसे  मान लिया जाय  कि   अन्ना   और   उनकी  टीम   लोक संप्रभुता  या लोक नियंत्रण  की संवाहक   है । परन्तु   यदि  अन्ना  के नेतृत्व  वाला नागरिक  समाज  लोक संप्रभुता  का  वाहक  नहीं  है  तो  यह  भी  पता लगाना होगा  कि   लोक सत्ता कहाँ से निःसृत  हो रही है । यह भी  ध्यान  रखना होगा कि लोक  इच्छा  वास्तव  में  जनसंख्या   ( Population )   की नहीं  जनता  ( People ) की  इच्छा  होती  है । यहाँ  जनता का अर्थ  है न्यायोचित  सिद्धांतो   के अनुसार  कार्यो  की पूर्ति में लगी हुई जनता ।  संख्या बल  यहाँ विशेष  महत्व नहीं रखता ।  तभी तो एक  समय था जब  राजग  की प्रथम  सरकार के पतन के समय इसी संसद ने  " पब्लिक मैंन्ड़ेट "  का मुहाविरा दिया था पर आज वही संसद " सेन्स  ऑफ़ द हाउस " की बात करती है । 

वास्तव  में  लोक संप्रभुता की धारणा एक अमूर्त धारणा है और स्वयं को अभिव्यक्त करने के    लिए  उसे  एक  चेहरे  की  आवश्यकता  होती है  और यदि वह  चेहरा अन्ना नहीं है तो क्यों  माननीय  प्रधानमंत्री ने  उन्हें  लिखित  आश्वासन  दिया  और  क्यों   उनकी  माँगो  पर  विचार  करने  के  लिए  संसद  का विशेष सत्र चलाया गया ।  अन्ना को   वैधता और  मान्यता तो  स्वयं  सरकार ने  दी  है और  वह  भी  सहज  रूप  में नहीं बल्कि  मोल - भाव  कर के ,  जन दबाव  के कारण ।

सच  कहे  तो  यह  पता लगाना किसी लोकतांत्रिक  सरकार और  उसके  नुमाइंदो  के  विवेक  पर है कि  वे  जाने कि लोक इच्छा  कहाँ  से और  कैसे   निःसृत हो रही है और  यदि वे इसका  पता लगाने में सफल  हो जाते है तो लोकतंत्र  का सही  स्वरुप  निखर  कर सामने  आता है ।

अन्ना और उनकी टीम  जनइच्छा की प्रतीक  भर है और  वह  इच्छा सही  और कठोर  लोकपाल  क़ानून के निर्माण के पक्ष  में है ।  ना तो अन्ना और  ना ही  जनता संसद  के खिलाफ है पर मौजूदा संदर्भो में वह उसके साथ  भी  नहीं है । सरकार  और  संसद  को  जनता द्वारा  प्रत्यक्ष रूप से वैधता दी गयी है पर वह मौजूदा व्यवस्था से खुश नहीं है । उसे लगता है कि राजनेताओं  में से अधिकाँश ने अपना एक अलग वर्ग बना लिया है और वे परस्पर दुरभिसंधि कर के एक दूसरे की रक्षा का कार्य कर रहे  है  ठीक उसी प्रकार जैसे  बड़े व्यापारी  आपसी समझौता कर एकाधिकार स्थापित कर लिया करते है ।  इस दुरभिसंधि के  खिलाफ  जनता को एक  नायक  की तलाश  है । यदि  मौजूदा राजनीतिक  संवर्ग   से कोई  व्यक्ति  इस हेतु  सामने आता तो  जाति, धर्म और वर्ग  की सीमाओं  से परे  उसे अपार जनसमर्थन  प्राप्त होगा अन्यथा  जिस  सीमा तक  अन्ना और  उनकी टीम  अपनी  शुचिता  बनाए रखती  है  उसे जनसमर्थन प्राप्त करने से कोई शक्ति  नहीं रोक  सकती ।

रविवार, 25 मार्च 2012

आरोहण

वह किरीट जो दमक रहा है ,
  इस किरीट की छवि के भीतर ,
कितने  काले सन्नाटे  हैं ,
  क्या क्या घाते प्रतिघाते हैं ।

              कितनी प्रकट वासनाओं  के,
               आवेदन हैं प्रतिवेदन हैं ,
             कितनी नग्न कामनाओं के 
                 कुत्सित , कुंठित उन्मोचन है ।

कितनी खण्डित प्रतिमाओ की ,
 छवियाँ उन्मीलित है इसमें ,
कितने छद्म मारतन्ड़ो की ,
  गरिमा भूलुंठित  है इसमें ।

              वह महान मस्तक जिस पर यह ,
                मुकुट अधतन चमक रहा है ,
             अन्दर ही अन्दर शायद वह ,
               इच्छाओं से धधक रहा है ।

किन्तु सार्थकता ही उसकी ,
 इस जलने तपने से निर्मित ,
है अस्तित्व सदा ही उसका  ,
  उसके रक्त स्वेद से निर्मित ।
   

सोमवार, 19 मार्च 2012

भारतीय पतन का प्रस्थान बिन्दु -२

भारतीय समाज आज अधिकांश रूप से अपनी नियंत्रण क्षमता का परित्याग कर चुका है।
हाल के तीन - चार दशको में हमें विशेष रूप से क्षरणशील होते हुए देखा गया है । राष्ट्रकवि
मैथलीशरण गुप्त के शब्दों में कहे तो - " हम कौन थे , क्या हो गए , और होगे क्या अभी ?"
भारतीय मानस इस पतन शील दशा में क्यों पहुँच गया यह प्रश्न विशेष रूप से विचारणीय
है । यह प्रश्न आत्महीनता का नहीं अपितु आत्मविश्लेषण का है और समकालीन दशाओं
में अनिवार्य रूप से विचारणीय है जिससे चाह कर भी बचा नहीं जा सकता है ।

          कहा जाता है कि " इतिहास अपनी तात्कालिकता में हमेशा शाश्वत होता है । " पंडित
नेहरु को  लिखे  अपने एक  पत्र में के एम मुंशी ने लिखा था - " भविष्य को ध्यान में रख कर
वर्तमान में कार्य करने की शक्ति मुझे अतीत के प्रति अपने विश्वास से ही मिली है । " व्यक्ति
की तरह समाज भी अपने इतिहास का भोक्ता या शिकार होता है । संकट की घडी में कई बार
हमें अपने इतिहास से ही शक्ति और समाधान दोनों  प्राप्त होते है ।तो तात्कालिक प्रश्न को
ध्यान में रख कर जब हम इतिहास की वीथिका में झाँकते है तो पता चलता है कि  राष्ट्रपिता
महत्मा गाँधी को आने वाले इस संकट का पूर्वाभास बहुत पहले ही हो गया था और संकेतो में ही
उन्होंने इस समस्या का समाधान भी सुझाया था , बापू लिखते है -
         
         " भारत के सामने इस समय अपनी आत्मा को खोने का ख़तरा है और यह संभव नहीं
           नहीं है कि अपनी आत्मा को खो कर वह जीवित रह सके । इसमें अपना शुद्ध और
           चेतन्य स्वरूप प्रकट करने की सहज  क्षमता अभी भी है । भारत ने आत्म शुद्धि के
           लिए  स्वेच्छा पूर्वक जैसा प्रयास किया है  उसका दुनिया में दूसरा कोई  उदाहरण नहीं
           मिलता ....................केवल भारत ही कर्म भूमि है अन्य सभी भोग भूमि हैं ।भारत
           यूरोप , जापान या चीन नहीं है ।इसकी नीयति विशिष्ट है । आलसी की तरह लाचारी
           प्रकट करते हुए उसे ऐसा नहीं कहना चाहिये कि पश्चिम की बाढ़ से मैं बच नहीं सकता
           अपनी और दुनिया की  भलाई के लिए उसे इस बाढ़ को रोकने  योग्य  शक्तिशाली
           बनना ही होगा ।यह तपश्चर्या की अमर  भूमि है , इसे अपनी नियति को स्वीकार करना
            ही होगा। "


बापू का यह कथन और उनके इस तरह के विचार परंपरा और आधुनिकता में किसी प्रकार का कोई द्वन्द उपस्थित नहीं करते जेसा कि bahut से लोग समझते है ,  हो सकता है कि आप उनके प्रयोगों से या कार्यनीति से असहमत हो ( यधपि वह एक अलग विषय है )  परन्तु उनके इस विचार की मूल भावना से असहमत होना कठिन है विशेष रूप से भारतीय संदर्भो में। गांधी  से भारतीय  संदर्भो में  गाँधी  भरसक  रूप से  भारतीयों  को  पश्चमी  सभ्यता के उस सर्वग्रासी प्रभाव से बचाना चाहते थे जो लालच और शोषण पर आधारित थी और जिसे वह शेतानी
सभ्यता कह कर पुकारते थे ।


    गांधी से पूर्व स्वामी विवेकानंद ने भी इस संकट को भिन्न स्वरुप में पहचाना था । सेनापति की तरह उन्होंने जनो को एकजुट होकर उठ खड़े हो जाने  के लिए पुकारा  -

              " प्रत्येक राष्ट्र का , प्रत्येक व्यक्ति की भाँति जीवन का एक मूल लक्ष्य होता है ,
                एक केंद्र बनता है , वादी स्वर होता है जिसका अवलंबन कर अन्य स्वर संगीत
                 में संगति पैदा करते है । जो राष्ट्र अपनी राष्ट्रीय  प्राण  शक्ति  को छोड़ना
                  चाहता है , सदियों से प्रवाहित अपनी दिशा को बदलना चाहता है , वह राष्ट्र
                   नष्ट हो जाता है । किसी राष्ट्र की प्राणशक्ति राजनीतिक  शक्ति  है  जैसे
                 इंग्लेंड की, तो किसी की कलात्मक जीवन और किसी की कुछ और । भारत
                 का केंद्र है - धार्मिक जीवन , राष्ट्रीय जीवन संगीत का वही आदि स्वर है ....
                 .......................इसलिए यदि तुम अपने धर्म का त्याग  कर राजनीति और
                 समाज का मार्ग पकड़ोगे ............. तब तुम लुप्त हो जायोगे ........समाज
                 सुधार और राजनीति की शक्षा तुम्हे धर्म के माध्यम से देनी होगी । "



भारतीय समाज के वर्तमान पतन का प्रस्थान बिंदु यही छिपा है । स्वतंत्रता के पश्चात अपनाई
गयी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में हमने कही भी , सच्चाई के  साथ  इस भाव को
सहेजने का प्रयास नहीं किया । भारत की आत्मा को समझे बिना हमने पश्चिमी करण को
ही आधुनिकी करण का पर्याय मान लिया । पश्चिमी संस्थाओं और व्यवस्थाओं को बिना सोचे
समझे भारत की देशी और जातीय परिस्थितियों में घुसेड़ने का प्रयास किया गया , हमने
भारत के मूल भाव को सहेजने वाला कोई समकालीन प्रतिमान स्थापित करने का प्रयास ही
नहीं किया  । आध्यात्मिकता और धार्मिकता को तो संस्थानिक स्तर पर मानो नकारात्मक
शब्द मान लिया गया । वास्तव में यह भारत की आत्मा को नकारने का प्रयास था ।


        हमारा प्रारम्भिक नेतृत्व इस बात को समझने में पूर्णतया असफल रहा कि हम एक
ऐसी व्यवस्था को अपनाने का प्रयास कर रहे है जो हमारी जीवन शैली के  पूर्णतया  विपरीत  है ।
हमारी जीवन शैली सामूहिकता को प्रश्रय देती है जबकि पश्चिमी जीवन शैली वयैक्तिकता
को अपनाती है ।हम , हमारे बिम्ब , हमारे प्रतीक सब कुछ पश्चिम से पूर्णतया अलग रहे है ।मैं
 यहाँ स्व॰  निर्मल वर्मा की कुछ पंक्तियाँ उधृत करना चाहुँगा -

             "  संस्कृति का भारतीय स्वरुप पश्चिम की सास्कृतिक धारा से नितांत भिन्न है ।
                यूरोपीय संस्कृति का आर्भिभाव ही व्यक्ति की विकसित आत्मचेतना से हो
                पाया है । इस आधार पर अकेले व्यक्ति ने यथार्थ का एक निजी , स्वायत्त
                दर्शन   सृजित  किया  है -  एक ऐसा दर्शन जिसकी जड़े , उसके   व्यक्तिगत
                अनुभव में निहित है । दूसरे शब्दों में पश्चिमी संस्कृति का प्रर्दुभाव एक ऐसी
                 खंडित चेतना  में हुआ है , जहाँ मनुष्य अपने को प्रकृति , विश्व और दूसरे मनुष्य से
                 बिलकुल अलग पाता है और उसे अनुभव होता है की इस अलगाव और विभाजन को
                  महज धार्मिक आस्था और परंपरा द्वारा नहीं पाटा जा सकता ।वह महसूस करता है
                  कि धर्म और  परम्परा उसे सांत्वना और  सहारा  तो  दे सकते है , किन्तु   उसके
                   अंदरूनी मर्म की गहरी परतो में नहीं पैठ सकते , जहाँ वह सम्पूर्ण रूप से स्वतंत्र
                    है और अपनी स्वतन्त्रता में सम्पूर्ण रूप से अकेला है । "


इस तरह धर्म पश्चिम के लिए व्यक्तित्व की पूर्णता को प्राप्त करने का एक यन्त्र मात्र है , धर्म उसके
संपूर्ण व्यक्तित्व को पारिभाषित नहीं करता । धर्म ही नहीं यदि परिवार और राज्य जैसी संस्थाये
भी उसके व्यक्तित्व की तथाकथित स्वतन्त्रता के आड़े आती है तो उसे उन्हें उसे भी तिलांन्जलि देने
मे हिचक नहीं होगी । वास्तव मे पश्चिम का व्यक्ति एक भौतिक मानव है आध्यात्मिक मानव नहीं ।
वह स्वयं को ब्रम्हांड की एक पृथक और स्वायत्त इकाई मानता है जिसकी तुलना अन्य  किसी से नहीं
की जा सकती।  पृथक अस्तित्व का यह भाव अपने चरम पर जा कर स्वयं को प्रकृति से भी अलग
समझने लगता है , और उसके भरपूर दोहन में  ही अपने यक्तित्व की सार्थकता मानने लगता है ।
पाश्चात्य सभ्यता भोगवादी है वह प्रकृति के अनुकूल जीने की जगह उसका दोहन करने में विश्वास करती है । दोहन और शोषण पर आधारित भोगवादी पश्चिमी सभ्यता अपना औचित्य
इसाई दर्शन के निम्न सूत्र से ग्रहण करती है -

                  "  तब ईश्वर ने नूह और उसके लड़को को आशीर्वाद दिया - फलदाई बनो ,
                    अपनी संख्या बाढ़ाओं और जमीन पर फैल जाओ । तुम्हारा आतंक जमीन के
                     जानवरों , आसमान के परिंदों , उन सब पर जो भूमि पर चलते है और सागर
                      की मछलियों पर फैल जाएगा , उन सब को तुम्हे सौंप रहा हूँ । जो ज़िंदा
                       है  और चलता है वह सब तुम्हारे खाने के लिए है । जैसे मैने तुम्हे वनस्पति
                       दी है , उसी तरह अब तुम्हे सब कुछ सौंप रहा हूँ । "
                                                                                       ( जेनेसिस ९ : १-३ )

किन्तु भारतीय सभ्यता इस प्रकार का कोई विभाजन नही करती । यहाँ व्यक्ति के भौतिक
अनुभवों और आध्यात्मिक अनुभवों में किसी प्रकार की विभेदक रेखा नहीं खीची गयी है ।
हम अपने सांसारिक अनुभवों को भी धार्मिक प्रतीकों द्वारा अभिव्यक्त करते है । हमारे
धार्मिक अनुष्ठान हमारे सांसारिक जीवन के साथ गहराई से जुड़े रहे है । भारतीय जीवन
दृष्टि भोग को स्वीकार भी  करती है किन्तु उसे शोषण की हद तक ले जाए बिना और संतुलित
मात्रा में । वह भोग को भी त्याग पूर्वक करने का उपदेश देती है और उसकी प्राप्ति हेतु एक
व्यवहारिक आचार संहिता - त्याग ( ब्रह्मचर्य ) , भोग ( गृहस्थ ) , त्याग पूर्वक भोग ( वानप्रस्थ )
और त्याग ( संन्यास ) - भी प्रस्तुत करती है । हमारे जीवन की पूर्णता मोक्ष में निहित है भोग
में नहीं ।


            स्वतंत्रता के पश्चात अपनाई गयी व्यवस्था में हमने उपरोक्त भारतीय आदर्शो की पूर्णतया
अवहेलना कर दी  इससे हमारे जीवन दर्शन और राजनीतिक दर्शन में एक विभेद पैदा होने लगा
वह आध्यात्मिकता जो हमारे समाज को दुष्प्रवृत्तियों  से बचाती थी और नियंत्रण क्षमता प्रदान
करती थी अब एक बाहरी  वस्तु मान ली गयी और हमारा समाज अपनी नियंत्रण क्षमता खो बैठा ।


           यहाँ सवाल दो महान संस्कृतियों की तुलना कर एक को कम और दुसरे को जादा सिद्ध
करने का नहीं है , सवाल है दो भिन्न जीवन दृष्टियों में तुलना करते हुए अपने मूल को ना
छोड़ने  का है और जैसा कि विवेकानंद ने कहा था कि " स्वतन्त्रता आध्यात्मिक प्रगति की
एकमात्र शर्त है और यूरोप ने राजनीतिक क्षेत्र में उसे भारत की तुलना में अधिक प्रभावी
ढंग से जाना है किन्तु आध्यात्मिक जगत में उसे उसने अत्यंत कम ही कल्पित किया है ।"
भारत स्वाधीनता को आध्यात्मिक जगत में कल्पित करता है और उसे सांसारिक  जीवन
में इस तरह पिरोता है कि वह व्यक्ति के सामाजिक अलगाव का साधन ना बन कर उसकी सामाजिक
सम्पूर्णता का प्रतीक बन जाती है । दुःख की बात है कि आज हम अपनी उसी विरासत को छोड़ देने
को उद्धत है जिसे संसार को हमारी सबसे बड़ी देन कहा जा सकता है , और वही हमारे सामाजिक
विखंडन का कारण भी बन रही है , जरुरत उस प्राचीन परम्परा को फिर से संरक्षित करने की
है जिसे हमने सदियों के अनुसंधान के बाद प्राप्त किया था ।
   
                                                                                                           ( समाप्त )

                                               

रविवार, 18 मार्च 2012

मैं अकेला !

मै अकेला कर रहा संघर्ष अविरल ,
समय से संघर्ष मेरा ,
सत्य है आदर्श मेरा ,
दूर से जो बह रही पुरवा हवा है ,
मूल ही उसका बना गंतव्य मेरा ।

                
                साक्षी इस द्वन्द की सारी धरा है ,
                 स्वेद से मेरे नहाई दस दिशा है ,
                 दे रहा हूँ हवि मै अपने रक्त की खुद ,
                 यज्ञ की वेदी बना कर देह सारी ,
                 और इसमें प्रज्जवलित जो हो रही है ,
                 मर्त्य नर के जन्म की पूँजी है सारी ।


देह में जो वाहि मेरे जल रही है ,
एक दिन सारा भुवन इसमें जलेगा ,
सामने जो दिख रहा फैला अन्धेरा ,
इस हुतासन की प्रभा में जल उठेगा ।


आज जो ये व्योम रक्तिम दिख रहा है ,
रक्त से मेरे रंगा है , मेरा ही लहू है ,
और जब ये मेघ बरसेगे कभी तो ,
रक्त ही मेरा धरा सिंचित करेगा ।   

बुधवार, 14 मार्च 2012

इतिहास जो बन ना सका ..........

"सत्ता भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूर्णतया भ्रष्ट करती है" - पिछले पांच सालो में उत्तर प्रदेश की मायावती अलेक्स्जेंदर पोप  के इस सुप्रसिध्द कथन की सटीक शहादत देती हुई नजर आयीं । यधपि उन्हें जो अवसर प्राप्त हुआ था वह स्वतंत्र भारत के राजनितिक इतिहास में दुर्लभ था । दलित राजनीति का प्रारम्भ वैसे तो जस्टिस पार्टी के उदय के साथ दक्षिण में हुआ था पर दलितों को सत्ता में आने का ऐसा सुयोग उत्तर में ही प्राप्त हुआ । परन्तु मायावती इस महान सुअवसर का लाभ उठा पाने से फिलहाल चूक गयीं है । सर्वसमाज का उनका नया नारा वास्तव में सत्ता प्राप्ति के लिए बनाए गए अवसरवादी गठबंधन के अतिरिक्त और कुछ साबित नही हुआ ।

                                 किन्तु अवसरवाद के कलंक को ढ़ोती हुई , यू . पी . की राजनीति में हाल तक बहु - प्रचलित रही , इस शब्दावली पर यदि गहनतापूर्वक विचार किया जाय तो अपने आप में  यह एक क्रांतिकारी अवधारणा है पर जिस प्रकार भारतीय राजनीति में भगवा और धर्मनिरपेक्ष आदि शब्द रूढ़ हो चुके है और अपने वास्तविक अर्थो को लगभग खो चुके है - कुछ वैसा ही हाल इस शब्द का भी हो गया है।  अब इसका ध्वनित अर्थ कुछ और है और अन्तर्निहित अर्थ कुछ और अन्यथा यह शब्द सामाजिक गतिशीलता को एक नया रूप दे पाने में समर्थ था । दलित वर्ग द्वारा सत्ता का सूत्र अपने हाथ में रख कर द्विज जातियों को दिशा देना - यह कल्पना ही अपने आप में क्रांतिकारी और अभूतपूर्व थी जिसे सकारात्मक दिशा में  और आगे बढाया जाना  चाहिये था किन्तु संस्थानिक भ्रष्टाचार और व्यक्तिगत सनक ने इसे  पूरी  तरह  निगल  लिया।

             वास्तव में सर्वसमाज की इस कल्पना को साकार रूप देने के लिए इतिहास की शव-साधना से मुक्त होने की जरुरत थी । उदारता और  इच्छा शक्ति का उचित मात्रा में संयोजन ही किसी भी राजनितिक व्यक्तित्व  को महान की श्रेणी में ला खडा करता है पर मायावती के व्यक्तित्व में प्रथम गुण का पूरी  तरह आभाव दिखाई दिया ।

            वह दल जो सत्ता के विकेंद्रीकरण के स्वप्न को ले कर खडा हुआ था सत्ता के केन्द्रीयकरण के कारण  भ्रष्टाचार   के  मायाजाल में उलझ कर रह गया । वास्तव में  किसी  भी  प्रकार  की  राजनीति  और विशेष  रूप  से  दलित  राजनीति  का  मार्ग  राजनितिक  उदारता के मार्ग के समांतर हो कर  गुजरता है ,  क्योकि सत्ता   प्राप्ति  के    बाद  दलितों   में  प्रदर्शनात्मक प्रवृत्ति का जन्म ले लेना अत्यंत स्वाभाविक  है और  यह  नेतृत्व  का  कार्य  है  कि  वह  सत्ता  के प्रतिष्ठान  को प्रदर्शनात्मक  प्रवृति से बचाए रखे ।

      जाति की समस्या का सही  इलाज जाति के विरोध की राजनीति में नहीं अपितु   जातीय  समरसता की राजनीति में है  ,  समरसता आ  जाने  पर  जाति  स्वयं  ही विलीनीकरण की दिशा में बढ़ने  लगेगी , पर क्या  हमारी  राजनितिक  व्यवस्था  ने सचेतन  रूप  से दिशा में कोई  कार्यक्रम  जैसे अंतरजातीय  विवाह  को  प्रोत्साहन  ,  सहभोज  आदि  प्रारम्भ  किया ,  शायद   नहीं ।  इसके विपरीत स्थिति  में  जातिगत  विभेद  को बनाए  रखना  ही  राजनितिक  सफलता की कुंजी बन जाती है । परिणामतः सामाजिक स्तर  पर  तो  यह  विभेद  कम  होता दिखाई  देता है पर   राजनीतिक  स्तर पर उत्तरोत्तर बढ़ता  ही जाता  है ।

              ध्यान  रहे  एक   बार सत्ता पा जाने पर दलित  वर्ग  तकनीकी रूप  से दलित   नही रह  जाता बल्कि  समर्थ  हो  जाता है ,  वह  सत्ता  का अधिष्ठाता हो  जाता है और  उसे  अपना  व्यवहार  भी  इसी के अनुरूप  नियोजित  करना  चाहिये  ,  तब  दलितों  को  स्वयम   को वंचित  वर्ग से जोड़ लेना चाहिये क्योकि सत्ता प्राप्ति के बाद उसे स्थायी  बनाए रखना अगला कार्य होता है और केवल  सहमति ही है जो  लोक तंत्र में सत्ता को स्थायी बनाने का कार्य  करती  है अन्यथा जनता भ्रष्टाचार के उस केंद्र को चुन लेगी जिसका भ्रष्टाचार उसे  तात्कालिक रूप से उसे अप ने अधिक अनुकूल  लगता है और यही हुआ भी । 

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

भारतीय पतन का प्रस्थानबिन्दु - १

मिनिर्वा में उल्लू तभी उड़ाते है जब रात गहरा जाती है , हाल के दिनों में भारतीय आकाश में भी एसेही उल्लू उड़ते हुए दिखाई दे रहे है । घटनाओं की एक लम्बी श्रृखला है जो बढ़ते हुए जन असंतोष   की ओर संकेत कर रही है। एम्स के छात्रों का आरक्षण के विरुद्ध आन्दोलन      , जेसिका  लाल  हत्याकांड   में   आए  फैसले के विरुद्ध  जनता  की तीव्र प्रतिक्रिया ,  मुंबई  हमले  के  बाद  व्यवस्था के खिलाफ  फैला जनाक्रोश , पश्चिम  बंगाल  का  सिंगूर  आन्दोलन   और  सबसे  बढ़  कर अन्ना  हजारे  के नेतृत्व में उठा जनलोकपाल आन्दोलन ,  सारी की सारी  घटनाएं  एक सामान्य तथ्य- व्यवस्था के प्रति जनता के मोहभंग को प्रदर्शित कर रही है ।        
              मार्क्सवादी  तर्क   का  उपयोग   करे    तो  कह   सकते  है कि पानी  अभी  उबल  रहा  है  पर सौ डिगरी सेंटीग्रेट  पर  पहुचते ही भाप बन  कर उड़ जाएगा  । जनता द्वारा स्वेच्छा से दी जाने  वाली  राजनीतिक वैधता ही है जो  किसी  भी राजनीतिक व्यवस्था को  गतिशील  बनाती  है पर जैस़ा की हाल के दिनों में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव  बान की मून  ने कहा था कि विश्व की राजनीतिक व्यवस्थाओ के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट विश्वसनीयता बनाए रखने का है । राजनीतिक विश्वसनीयता के इस महान संकट से भारत भी  अछूता नहीं है। " सारे नेता चोर है "- यह भावना आम भारतीय के मन में घर करती जा रही है पर खेद की बात है कि मुख्य धारा का कोई भी दल इस तथ्य को सही  और जनतांत्रिक अर्थो में समझने को तैयार नही दिखता । 

                  भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के समक्ष इस समय यक्ष प्रश्न यह है कि वह जनता के मध्य अपनी साख को किस प्रकार बचाए ? वास्तविकता तो यह है कि सामान्य रूप से भारतीय राजनेताओं ने अपना एक अलग सामाजिक राजनितिक वर्ग बना लिया है जिसका हित जनता के हितो से पूर्णतया अलग है । भारत में परेतो , मोस्का  आदि विशिष्टवर्गवादियों की यह समझ काफी हद तक सत्य होती दिखाई देती है कि लोकतंत्र में भी सत्ता कुछ गिने चुने विशिष्ट वर्गों तक ही सीमित  रहती है ।

आखिर क्यों हमारा जनतंत्र अरस्तू द्वारा वर्णित भीड़तंत्र में परिवर्तित हो गया या होता जा रहा है ? यदि ध्यान पूर्वक देखे तो भारतीय राजनीति की इस दुर्दशा के लिए भारतीय समाज भी  कम उत्तरदायी नहीं है ।हमारा राजनीतिक परिसर हमारे सामाजिक परिसर से अलग नहीं हो सकता ।
 आदर्श  स्थति में  समाज को यह निर्देशित  करना चाहिये  कि राजनीति  क्या करे ?
पर यहाँ तो  राजनीति समाज को निर्देशित करती दिखाई  दे  रही है और वह भी सत्ता  की पूरी
धमक  और अहंकार  के साथ । कभी  -  कभी  तो  ऐसा  लगता है कि  भारतीय समाज अपनी
निर्देशन क्षमता पूरी  तरह  खो  चुका  है । याद  करे ,  आज  के पच्चीस - तीस  वर्ष  पूर्व  हमारे
गाँवो  में यदि  कोई ह्त्या या जार कर्म जैसे अपराध  करता  था तो  उसका  सामाजिक बहिष्कार
कर  दिया जाता था पर  आज की स्थति इसकी ठीक उल्टी है ।सत्ता के चरण -  चुम्बन  की
प्रवृत्ति  सर्वत्र व्याप्त दिखायी देती है ,  सफलता किसी भी  कीमत  पर  हमारा  मूल -  मंत्र बन
चुका है । साध्य और साधन  का सिद्धांत  गांधी   के अपने  भारत  में  कूड़ेदान  की  वस्तु   बन
चुका है ।  ऐसे लोग  जिन्हें  कभी समाज बहिष्कृत  कर  गाव  के  बाहर  रहने  को  बाध्य  कर
दिया करता था आज भारत की ह्रदय  स्थली  दिल्ली में  संसद  में  बैठने  को प्रयासरत दिखाई
देते है । सच तो यह है कि ऐसे लोगों में  यह हिम्मत  ही नहीं  पैदा होनी  चाहिये थी ।

         भारतीय  समाज  के पराभव से भारतीय  राजव्यवस्था   की क्षरणशीलता  के  इस  निष्कर्ष
पर  पहुचते   ही  दूसरा  प्रश्न  उठ खडा  होता  है    कि  आखिर  यह  स्थिति  पैदा  क्यों  हुई ।  यदि
ध्यानपूर्वक  देखा  जाय   तो भारतीय  समाज  में  दिख  रही यह  कमजोरी  आजादी  के  बाद  कुछ 
जादा ही बलवती हुई  है । हम यह तो नही कह सकते कि इसके  पूर्व   भारतीय  समाज  अपने
आदर्श    स्वरुप  में  था क्योकि यदि ऐसा  होता तो  राष्ट्र को  पराधीनता का इतना लंबा दुस्वप्न
ना झेलना पड़ता  परन्तु  यह अवश्य कहा जा  सकता है  कि इसके    पूर्व  हमारा  समाज अपने प्रभु वर्ग की अपेक्षा मूल्यों के प्रति अधिक सचेत था तथापि तब वेह अपने शाशको को अधिक प्रभावित नही कर पाता था    किन्तु   राष्ट्रीय  आन्दोलन  की पृष्ठभूमि  में जनता पर्याप्त रूप से सचेत हुई और स्वतन्त्रता के उपरान्त लोकतंत्र को स्वीकार करने के कारण वह राज्य को प्रभावित करने की स्थिति में भी आ गयी ।


      दुर्भाग्य  की बात है  कि स्वतन्त्रता के  बाद हम इस सुअवसर का लाभ नहीं उठा सके ,  लोक   को
 जिस  सीमा तक  तंत्र  को प्रभावित  या निर्देशित  करना  चाहिये था वह  नहीं कर सका और लोकतंत्र  का विकास  अपने  सकारात्मक  स्वरुप  में  नहीं  हो  पाया । इसका   मूलकारण   था   स्वयं   भारतीय समाज का ही पतोन्मुख हो जाना । हम लोकतंत्र में निहित लोक और तंत्र के अन्न्योंनाश्रित सम्बन्ध को आत्मसात कर पाने में असफल रहे ।

                                                                                                      (  शेष अगले अंक में )

रविवार, 5 फ़रवरी 2012

भग्नावशेष

यह जो मेरे हृदय के भग्नावशेष ,
  तुम्हारी आँखो में प्रतिबिंबित हो रहे है ,
न जाने कितने पलों का इतिहास ,
   स्वयं में समेटे  हुए हैं ,
वे पल जिन्हें कोई जी ना पाया ,
   जिनका उपयोग कोई  ना कर पाया
सपनो  के गठ्ठर स्वयं में समेटे हुए है ,
    ये जो मेरे हृदय के .................



न जाने कितने शिल्पियों की कल्पनाएँ ,
  इन पत्थरो के नीचे दबी पड़ी है ,
वे कल्पनाएँ जो मूर्त रूप ना ले पायी ,
  जो मेरी सुप्त इच्छाओं से युद्धरत है ,
   कि क्यों नकार दिया, तुमने,
    अपने निर्माणकर्ता का कौशल ,
   ऐसे विह्वल समायोजन से ,
   स्वयं को लपेटे हुए है ,
  ये जो मेरे हृदय के ..................



मुझमे और तुझमे अंतर मात्र इतना है ,
  कि मेरे दिनों का रोजनामचा ,
तुम्हारे सामने खुला पड़ा है ,
   पर तुमने अभी उसे खोला नहीं है ,
पर इतना तो निश्चित है ,
कि तुम भी मेरे जैसे अवश्य होवोगे ,
  एक दिन तुम भी समय के गर्त में खोवोगे ,
तब मे करुँगा उपहास तुम्हारा ,
   माँगूगा उन अजन्मे क्षणों का प्रतिकार ,
जो तुमने मुझसे छीने है ,
   ये जो मेरे हृदय के .................

                                                                     

रविवार, 29 जनवरी 2012

संस्कृति , प्रतिसंस्कृति और अपसंस्कृति - ४

९० के दशक में एक और बड़ी घटना घटी । भारत का सामना अब अकस्मात् उदारीकरण और 
वैश्वीकरण  से  हुआ ।       यह प्रक्रिया अपने साथ आर्थिक बदलाव तो ले कर आई ही , सांस्कृतिक 
रूप से एक बड़े परिवर्तन की वाहक भी बनी । कम से कम जमीनी स्तर पर उदारीकरण का
प्रभाव आर्थिक रूप में कम और सांस्कृतिक रूप में अधिक दिखाई देता है । राह चलते नुक्कड़
की पान की दूकान पर जब आप लोक - संगीत की जगह ब्राजील जैसे कैरेबियन गाने की धुन
सुनते है या फिर युवा वर्ग में ब्रांडो के प्रति बढती ललक देखते है तो यह सांस्कृतिक रूप से
आपको चौंकाने वाली स्थिति होती है । यह सम्पूर्ण प्रक्रिया अत्यंत व्यवस्थित और सुनियोजित
ढंग से प्रारभ हुई है और सबसे बड़ी बात कि इसे हमने खुद आमंत्रित किया है । मॉस मीडिया
और प्रचार माध्यमो - विज्ञपनो द्वारा एक पूर्णतया उन्मुक्त और भोगवादी संस्कृति हम पर
थोपी जा रही है और वह भी इतनी  तेजी से कि एक पूरी कि पूरी पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी
से अजनबी बनती जा रही है । यह संस्कृति ( या अपसंस्कृति ) पहले तो  झूठी आवश्यकताएं
पैदा करती है और फिर  उपभोग  को  बढ़ावा  देते   हुए  उन्हें  एक  एसे  आदर्श के  रूप  में  प्रस्तुत
करती  है  मानो  उनका  उपयोग  करना  करना  ही  समकालीन  होने  या  आधुनिक  होने  की  पहली
शर्त  हो । इस  पूरी प्रक्रिया में आपके सामने  सिर्फ  और  सिर्फ  साधन  प्रस्तुत  किये  जाते है और
साध्य को पूरे दृश्य  से बाहर  रखा जाता  है या फिर प्रयास किया जाता है कि व्यक्ति उसे  भूल
जाए ।

          स्थितियां चेतावनी अवश्य देती है परन्तु पूर्णतया निराशाजनक भी  नहीं है ।उपभोक्तावाद
का यह मायावी चरित्र अभी ऊपरी  तौर पर ही उभर  पाया है व्यक्तिगत  जवाबदेही और नैतिकता
आज भी अपनी उपस्थति  दर्ज  कराती  है । इसके पीछे   मूलकारण भारतीय  समाज में  निहित
परिवार के प्रति आस्था और  आध्यात्म  की भावना  है । पाश्चात्य उपभोक्तावाद प्राच्य भारतीयता
के साथ संतुलन साधने को बाध्य है , यह  हमारी  संस्कृति की  मजबूती  का प्रमाण  और  हमारी
संयोजनशीलता  और  ग्रहणशीलाता  का धोतक  है ।

    वास्तव  में  यदि  इस  संक्रमण  से  विजयी  हो  कर  बाहर  निकलना  है  तो  हमें   ऐसी  वैश्विक  संस्कृति
निर्मित  करनी  होगी  जो  सही  अर्थो  में  मानवीय  वा   अंतर्राष्ट्रीय   हो   (  यधपि  हम  उससे  पूर्व  परिचित
 है उसे  नए  रूप  में  ढलना  भर  है )  या फिर  एक  ऐसी  प्रतिसंस्कृति   निर्मित करनी होगी जो हमारी
परम्पराओं  और  आधुनिकता  को  साथ - साथ  जीवित रखे  ।  शायद   वह  प्रति  संस्कृति  निर्माण  की
 प्रक्रिया   में हो ।  
                                                                                                                   ( समाप्त )

रविवार, 22 जनवरी 2012

संस्कृति ,प्रतिसंस्कृति और अपसंस्कृति - ३

अंग्रेजो और भारतीयों में हुए इस एकतरफ़ा संपर्क का परिणाम भारतीयों में आत्महीनता के भाव के उदित होने के रूप में हुआ यधपि लाभ भी हुए इसमें संदेह नहीं है। भारतीय पुनर्जागरण के प्रतीक पुरुष राजा राम मोहन राय बेन्थम के उपयोगितावाद से प्रभावित  रहे जबकि आधुनिक भारत के राज
नेताओं की पहली पीढ़ी अंग्रेजो की स्तुति करते हुए दिखाई देती है । भारतीय और आंग्ल संस्कृति के सबसे
सच्चे और आदर्श उदाहरण के रूप में गाँधी जी को देखा जा सकता है । थोरो , तालस्ताय   के दर्शन , रस्किन
की प्रसिद्ध पुस्तक अन टू द लास्ट तथा बाइबिल के अध्याय सरमन   आफ  द माउंट के साथ   गीता ,
उपनिषदों , जैन  वा  बौद्ध  शिक्षाओं  और   राम  चरित्र  का  उन  पर   कैसा  और  क्या  प्रभाव  पड़ा  इसे  बताने  की  आवश्यकता नहीं है ।


                             स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय जनमानस दोहरी आकान्क्षाओ के साथ आगे बढना चाह रहा था । एक तरफ वह भौतिक रूप से समृद्ध होना चाह रहा था तो दूसरी ओर विश्व गुरु कि
छवि को जीवित  रखते  हुए दुनिया को आगे का रास्ता दिखाने का कार्य भी करना चाह रहा था । १९६७ ई॰ तक की नेहरुवादी नीतियाँ इसी भाव को परिलक्षित कर रही थी । जहाँ एक ओर भाखड़ा
और भिलाई  जैसे  कारखाने  बनाये जा रहे थे और  उन्हें  आधुनिकता के  मंदिर  करार  दिया जा रहा था
वही  दूसरी ओर  अंतर्राष्ट्रीय  स्तर पर  पंचशील  का  अनुशीलन  किया  जा रहा  था  जो   प्राचीन   भारत
के   विचारों  को  स्वयं  में   समोए  हुए  थी  और  उसी  का   प्रतिनिधित्व  करती  थी । गुटनिरपेक्षता  की
नीति    कहीं   न   कहीं  विश्व  गुरु की छवि को जीवित  रखने   का   प्रयास  थी । इस  सारे  परिदृश्य में
राष्ट्रीय  आन्दोलन   से  सम्बद्ध एक  वर्ग  ऐसा  भी था जो   इन स्थितियो  को  अपने  आदर्शो  के  मुताबिक
नहीं पा रहा था ।   उसकी   दृष्टि  में  स्वराज तो   मिल   गया  था पर   सुराज   का   आगमन  अभी  तक  नहीं  हो  पाया  था  ।  जे ॰पी॰ , बिनोबा  और  लोहिया  आदि  इसी  वर्ग से  सम्बन्धित थे ।

         इस  तरह  नया  भारत  दो  संस्कृतियों  के  बीच  बँटा  हुआ  था । एक  वर्ग  आधुनिकता  और परंपरा 
का  मेल  चाहता  था  तो  दूसरा  आधुनिकता  की  कीमत  पर  भी  परंपरा  को  जीवित  रखना चाहता था । बाद  में  सर्वोदय  आन्दोलन  और  भूदान  आदि  के  असफल   हो  जाने  से  यह  सिद्ध  हो गया कि  नए  भारत  ने  पहले  रास्ते  को  स्वीकार  कर  लिया  है ।  किन्तु   इस रास्ते में भटकाव  की    संभावना 
अधिक  थी   क्योकि    संतुलन   का   रास्ता  संन्यास  से  अधिक   कठिन  होता  है।इससे एक ऐसी पीढ़ी
तैयार  हुई  जो छद्म जीवन जीती थी , जो  करती  कुछ  थी और  दिखाती  कुछ और थी ।  इस तरह एक 
कचरा   संस्कृति  निर्मित  होने  लगी  । यह  सपूर्ण  स्थिति   भारतीय  दुविधा को  दिखा  रही  थी  कि वह 
किस  और  जाए  और  कौन  सा  रास्ता  चुने ?   
                                                                                                              ( शेष अगले अंक में )             

रविवार, 15 जनवरी 2012

संस्कृति , प्रतिसंस्कृति और अपसंस्कृति - २

सांस्कृतिक  मिलन की यह निरंतर प्रक्रिया स्वाभाविक रूप से चलती ही रहती है , परन्तु यदि इसे बलात् बाधित किया जाय या रोकने का प्रयास  किया जाय तो इसके परिणाम विध्वंसात्मक होते है | भारत में
मध्यकाल में कुछ ऐसा ही दृश्य उपस्थित हुआ | प्रारम्भ में जब इस्लाम ने भारत में कदम रखे तो एक
रोचक दृश्य उत्पन्न हुआ | यह संसार की प्राचीनतम  और नवीनतम संस्कृतियों का एक दूसरे से प्रथम मिलन
  था  जिन्हें  आगे  चल कर एक - दूसरे के साथ - साथ  रहना था | एक  बार  पुन संलयन  की प्रक्रिया प्रारम्भ  हुई , सूफी  मत  का  आगमन ( जिसका  मूल तो  मध्य  एशिया था पर  भारत में उसका एक सर्वथा नवीन
संस्करण दिखाई दिया )  , ताजिया निकालने की परंपरा  ( जो सिर्फ भारतीय उपमहाव्दीप की विशेषता है |)
आदि  तथ्य  इस  बात  की  पुष्टि करते है | अकबर की सुलह कुल नीति और दीन ए इलाही धर्म इसी प्रक्रिया का स्वाभाविक परिणाम  थी | दुर्भाग्यवश  यह  प्रक्रिया  आगे चल कर बाधित कर  दी  गयी | दारा  शिकोह
और  औरंगजेब का  सत्ता  संघर्ष  इसी  बाधित  किये  जाने  की प्रक्रिया का  प्रतीक  कहा  जा  सकता  है |
दारा जहाँ सांस्कृतिक  संलयन का  प्रतीक था  वही औरंगजेब  रुढ़िवाद  का और  दुर्भाग्यवश  रुढ़िवाद की
विजय हुई | संलयन की प्रक्रिया  बलात्  बाधित की गयी , इससे एक अपसंस्कृति  का  उदय हुआ जिसका
चरमोत्कर्ष  अंततः  हम  भारत  के  विभाजन  के रूप में  देख  सकते  है | यह  अकस्मात्  नहीं  कि शेख
सरहिन्दी  जो   एक  शुद्धतावादी  नेता  था  का  नाती  औरंगजेब का  आध्यात्मिक  मार्गदर्शक  था  और
पाकिस्तान  के  दार्शनिक  प्रणेता  मुहम्मद  इकबाल  का  गुरु  भी  सरहिन्दी  की  ही परंपरा  का था |

               c

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

संस्कृति , प्रतिसंस्कृति और अपसंस्कृति - १

संस्कृति स्वयं में एक निरन्तर और समग्र संकल्पना है | ऐक ऐसी संकल्पना जो अत्यंत बहुआयामी है और जीवन के समस्त पक्षो को स्वयं में समेट लेती है | किसी भी राष्ट्र और समाज की पहचान  उसकी अपनी संस्कृति से होती है  | वास्तव में जब हम राजनीतिक दृष्टिकोण से  बहुराष्ट्रीयता की बात करते है तो सामाजिक दृष्टिकोण से बहुसांस्कृतिकता की ही बात कर रहे होते है | ये बहुसंस्कृतियां एक दूसरे के  लिए प्रतिसंस्कृतियों का काम करती है जिससे अंततः एक नवीन और अधिक उच्चतर, समग्र और विशिष्ट
संस्कृति का निर्माण होता है जिसे राजनितिक अर्थो में हम राष्ट्रीयता  कहते है |
      
              संस्कृतियों का यह द्वन्द वास्तव में कोई संघर्ष नहीं है अपितु एक दूसरे को समझने , आत्मसात करने और विशुध्दीकरण की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है | यह प्रक्रिया कुछ - कुछ जर्मन दार्शनिक हीगल के द्वंदवाद के समीप है जहा वाद ,प्रतिवाद और संवाद के संलयन से संवाद का जन्म होता है जो अधिक उच्चतर  और सत्य के अधिक समीप होता है | परतु यहाँ संवाद कभी भी परम या पूर्ण नहीं होता , यह तो एक निरंतर गतिशील प्रक्रिया है जिसका कोई अंत नहीं होता | मानव प्रज्ञा के निरंतर अनुभव इसमें जुड़ते ही चले जाते है और जब तक मानव है , संस्कृतियों का अस्तित्व बना रहेगा | संस्कृतियों के लुप्त होने पर मानव अस्तित्व पर भी सवालिया निशान लग जाएगा |

                         यदि हम इतिहास पर दृष्टी डाले तो पायेगे कि हजारो वर्षो पूर्व द्रविणो या अनार्यो के विरुद्ध आर्य संस्कृति भी एक प्रतिसंस्कृति की भाँति  ही  आयी थी जिसके द्वन्द से एक नवीन संस्कृति का जन्म हुआ जिसमे आर्य और द्रविण दोनों के ही प्रतीक शामिल थे | आर्यों में लिंग पूजन तांत्रिक अनुष्ठानो का
प्रारम्भ , द्रविण  संस्कृति का ही प्रभाव था | ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध बौद्ध धर्म का प्रारम्भ भी इसी सांस्कृतिक द्वन्द का परिणाम था जिसने ब्राह्मण धर्म को एक नया रूप धारण करने को विवश किया जो जनआकांक्षाओं और आवश्यकताओ को जादा बेहतर ढंग से सहेजता था | उदाहरणार्थ गाय को पूर्णतया अवध्य माना जाना  बौध धर्म के उदय के पश्चात् ही शुरू हुआ | संस्कृतियों के मिलन की यह प्रक्रिया सपूर्ण भारतीय इतिहास में स्वाभाविक रूप से देखने को मिलती है | अशोक द्वारा यूनानी  प्रभाव वाली खरोष्ठी लिपि का प्रयोग , भारतीयों द्वारा पगड़ी का प्रयोग किया जाना जो मध्य एशियाई कुषाणों की देन है आदि अनेकानेक उदाहरण इस धारणा की पुष्टि करते है |
                                                                                                                 [ शेष अगले अंक में ]
        
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